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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
स तथेति चिरेणोक्त्वा स्वभावाच्चिरकारिकः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ कन्यां तां प्रतिगृह्य च |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ गा रक्षित्वा पुनरुपाध्याय़गृहानेत्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
४६ क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ तय़ा समभवन्मुनिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ निराहारस्ता गा अरक्षत् |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ निश्चक्राम महातपाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ राजन्वरुणमव्रवीत् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ लोमशः सुमहातपाः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ सावित्र्या वचनं नृपः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य कीटो वर्त्मन्यतिष्ठत |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय़ |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजय़ित्वा च नारदम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
स तथेत्यव्रवीद्राजंस्तं च देशं जगाम ह ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुरुशुश्रूषणपरोऽवसत् |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेत्युक्त्वा तमश्वमधिरुह्य प्रत्याजगामोपाध्याय़कुलम् |
१६२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेत्युक्त्वा पुनररक्षद्गाः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनैनं भोजय़ामास ||
१२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
स तथैव क्षुधाविष्टः स्पृष्ट्वा तोय़ं यथाविधि |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुव्धो गात्राण्यतापय़त् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
स तथोक्तो महावाहुः सर्वभारसहं नवम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
स तथ्यं मम तच्छ्रुत्वा व्राह्मणो राजसत्तम |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
स तदन्नमुपादाय़ गतो वकवनं प्रति |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
स तदप्यस्य कौन्तेय़श्चिच्छेद नतपर्वणा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
स तदा छिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
स तदा तद्वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
स तदा दूतमाज्ञाय़ पुनः क्षत्तारमीश्वरः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
स तदा मन्युनाविष्टस्तपस्वी भृशकोपनः |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
स तदाज्ञाय़ दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रिय़म् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
स तदात्मापराधेन सम्प्राप्तो व्यसनं महत् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
स तदादाय़ मिथुनं राजाथ कृपय़ान्वितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
स तदाभ्यर्च्य दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यपतिरीश्वरः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
स तदासनमादाय़ वहुरत्नविभूषितम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स तदासाद्य भूतं वै विलय़ं तूलवद्ययौ ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तदाह्वानमुपाध्याय़ाच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचोच्चैः |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
स तदुत्सृज्य देहं स्वं धारय़न्व्रह्म केवलम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स तद्गतेन मनसा वभूव क्षुभितेन्द्रिय़ः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स तद्गृहस्योपरि वर्तमान; आलोकय़ामास धनाधिगोप्ता |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
स तद्गृह्य धनुःश्रेष्ठं तस्थौ स्थानं समाहितः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स तद्दिव्यं वनं पश्यन्दिव्यगीतनिनादितम् |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
स तद्दिव्यमदीनात्मा परमास्त्रमचिन्तय़त् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
स तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं; जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
स तद्धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स तद्भुङ्क्ष्व महाराज सपुत्रः ससुहृज्जनः ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
स तद्भूतश्च सर्वेषां भूतानां भवति प्रभुः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
स तद्राजा वचः श्रुत्वा विप्रिय़ं दारुणोदय़म् |
२६ क