वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सा मुक्ताभ्यहनच्छक्तिर्महिषस्य शिरो महत् |
६६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सा मुहूर्तमिव ध्यात्वा दुःखामर्षसमन्विता |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
सा मूर्तिः सर्वभूतानामित्येवमनुशुश्रुम ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
सा मे दीय़तामिति ||
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
सा मे मूत्रं पुरीषं च प्रतिजग्राह माधव ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
सूर्य उवाच
सा मय़ा सह सङ्गम्य पुनः कन्या भविष्यसि |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
शर्मिष्ठो उवाच
सा यं कामय़ते कामं करवाण्यहमद्य तम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
सा यं कामय़ते कामं स कार्योऽद्य त्वय़ानघे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपतेः |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
सा योधसङ्घैश्च रथैश्च भूमिः; शरैर्विभिन्नैर्गजवाजिभिश्च |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
३
द्रौपद्यु उवाच
सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा ते भूद्दुःखमीदृशम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
सा राजभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सा रात्रावभवद्राजंस्तरुणी देववर्णिनी |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतितीरजम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
सा लोहितमहावृष्टिरभ्यवर्षन्महावलम् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात्ततस्ततः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सा वद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना च तथा पाण्डवानामनीकिनी |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना महती सेना तव जनाधिप |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना शल्येन पाण्डवानामनीकिनी |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना समरे केकय़स्य महाचमूः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना समरे धार्तराष्ट्री महाचमूः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना समरे पाण्डवानां महाचमूः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना समरे पाण्डुसेना महात्मभिः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सा वध्यमाना समरे पुत्रस्य तव वाहिनी |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा |
८० क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
सा वनानि विचित्राणि रमणीय़ानि सर्वशः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
सा वभूव विसर्पन्ती त्रिधा राजन्समुद्रगा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
सा वलिं त्वरिता देवी धर्माय़ोपजहार ह |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
सा वहून्भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
सा वह्निना वार्यमाणा देवैश्चापि सरिद्वरा |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
सा वान्धवभय़ाद्वाला तं गर्भं विनिगूहती |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
सा वाष्पकलय़ा वाचा निःश्वसन्ती पुनः पुनः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सा वाहिनी शान्तनवेन राज्ञा; महारथैर्वारणवाजिभिश्च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
सा विग्रहवतीव श्रीः कान्तरूपा वपुष्मती |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सा विग्रहवतीव श्रीर्व्यवर्धत नृपात्मजा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
सा विनिश्चित्य वहुधा विचार्य च पुनः पुनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिय़ा |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
सा विश्वस्य जननीत्येवमस्यार्थोऽनुभाष्यते ||
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
सा विस्मय़समाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
सा वेद तमभिप्राय़ं भर्तुश्चित्तवशानुगा ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
सा वेदिर्वेदसम्पन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
सा वै तदा मृत्युसञ्ज्ञापदेशा; च्छापाद्भीता वाढमित्यव्रवीत्तम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
सा वै तस्याभवन्माता पिता चेति हि नः श्रुतम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
सा वै पित्राभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ |
६ क