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वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
सा वै प्रसादय़ामास तं गुरुं पुत्रकारणात् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
सा वै महानसे प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता |
६ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
सा वै यथा समादिष्टा तत्रास्ते त्वत्प्रतीक्षिणी |
१० क
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
सा वै यथा समादिष्टा तत्रास्ते त्वत्प्रतीक्षिणी |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
सा वै शतसहस्रस्य संमिता सर्वघातिनी |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
सा वो दास्यं समापन्नान्मोक्षय़ामास भामिनी |
३० क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भामिनी |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
सा व्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
सा व्राह्मणं तदा दृष्ट्वा संस्थितं भैक्षकाङ्क्षिणम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
सा व्राह्मणाय़ मे दत्ता प्रेत्यार्थमभिकाङ्क्षता ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
मार्कण्डेय़ उवाच
सा व्रूहि विस्तरेणेति पित्रा सञ्चोदिता शुभा |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८६
सूर्य उवाच
सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रशः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
सा शक्तिर्वासुदेवेन व्यंसितास्य घटोत्कचे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
सा शङ्कमाना तत्पापं चिकीर्षन्ती च तत्प्रिय़म् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
सा शङ्कमाना भर्तारं नलं वाहुकरूपिणम् |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
सा शङ्कमाना रुदती दैवं शरणमीय़ुषी |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव सङ्गता |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
सा शप्ता तेन क्रुद्धेन विश्वामित्रेण धीमता |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
सा शोकार्ता च हृष्टा च दृष्ट्वा गोविन्दमागतम् |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
सा श्रुत्वा शोकसन्तप्ता पपात वरवर्णिनी |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
सा सखीभिः परिवृता सर्वाभरणभूषिता |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
सा सभा तादृशी दृष्टा सर्वलोकेषु दुर्लभा |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
सा सभा तादृशी राजन्मय़ा दृष्टान्तरिक्षगा |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
सा सभाद्वारमासाद्य रुदती मत्स्यमव्रवीत् |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
सा समाश्वासिता तेन भीमसेनेन भामिनी |
९ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
सा समीक्ष्य ततो देवान्पुण्यश्लोकं च भारत |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
सा समीक्ष्य तथारूपामनाथामेकवाससम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
सा समीक्ष्य तु तान्सर्वांस्तुल्यरूपधरान्स्थितान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
सा समुत्सृज्य तं दुःखाद्दीप्तवैश्वानरप्रभम् |
६६ क
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
सा सारथ्यं मम भ्रातुः कुरु साधु वृहन्नडे |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
सा सिच्यमाना अष्ठीला अभवच्छतधा तदा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय़ मारिष |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
सा सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सा सुसूक्ष्मां कथां श्रुत्वा तथ्यं नेति ससंशय़ा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
सा सृष्टा वहुधा जाता क्षरमाणा पय़ोऽमृतम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतन्त्रपराय़णा ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सा सेना नैरृती भीमा सघण्टोच्छ्रितकेतना |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
सा सेना महती राजन्पाण्डुपुत्रस्य संय़ुगे |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
सा स्त्री प्रोवाच भगवन्द्रक्ष्यसे देशकालतः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सा स्म सञ्चोदय़िष्यन्तं योगवन्धैर्ववन्ध ह ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता |
६८ क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
सा हता सूतपुत्रेण राजपुत्री समज्वलत् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सा हन्यमाना पार्थेन पुत्रस्य तव वाहिनी |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
सा हि दुर्योधनस्यासीन्मतिः कर्णस्य चोभय़ोः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभिरीदृशम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
सा हि पुत्रसमा राजन्विहिता कुरुनन्दन ||
२५ ग