द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सिंहवन्नदत प्रीताः शोककाल उपस्थिते ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
सिंहव्याघ्रगजप्रख्यैः सर्वजातिसमन्वितैः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
सिंहव्याघ्रगजाकारैरतिघोरैर्महाशनैः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहव्याघ्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रय़यौ दिशम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारय़ते पुनः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहव्याघ्रगणांश्चैव मर्दमानो महावलः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सिंहव्याघ्रतरक्षूणां यथेभमहिषर्षभैः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
सिंहव्याघ्रप्रय़ुक्तेन विमानेन स गच्छति |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सिंहव्याघ्रप्रय़ुक्तैश्च मेघस्वननिनादितैः |
१०० क
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
सिंहव्याघ्रवराहर्क्षरुरुद्वीपिनिषेवितम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
सिंहव्याघ्रवराहाश्च महिषा वारणास्तथा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगगणाकुलाम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
सिंहव्याघ्राः सशरभा मत्ताश्चैव महागजाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहव्याघ्राश्च सङ्क्रुद्धा भीमसेनमभिद्रवन् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगाय़ुतम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्वरावृतः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
सिंहशार्दूलवाङ्नेत्राः सिंहशार्दूलगामिनः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तद्विरदविक्रमैः |
७५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तद्विरदविक्रमैः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहशार्दूलसदृशैर्वारणैरिव यूथपम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
सिंहसंहननाः सर्वे पाण्डुपुत्रा महावलाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहसंहननो वीरः सिंहविक्रान्तविक्रमः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहस्कन्धोरुवाहुस्त्वां वृत्ताय़तमहाभुजः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सिंहस्य विषय़ं प्राप्तो यथा क्षुद्रमृगस्तथा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
सिंहस्य सततं पार्श्वे सिंह एव जनो भवेत् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सिंहस्येव गन्धमाघ्राय़ गावः; संवेष्टन्ते शत्रवोऽस्माद्यथाग्नेः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
सिंहस्येव मृगा राजन्व्यद्रवन्त महाभय़ात् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहाः केसरिणो व्याघ्रा महिषा वारणास्तथा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सिंहानामामिषेप्सूनां कूजतामिव संय़ुगे ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सिंहानामिव संह्रादो दिवमुर्वीं च नादय़न् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
सिंहान्वज्रप्रणुन्नेभ्यो गिर्यग्रेभ्य इव च्युतान् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सिंहान्व्याघ्रान्वराहांश्च नागांश्च मनुजाधिप |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
सिंहान्सुरेन्द्रो व्याघ्रांश्च द्वीपिनोऽन्यांश्च दंष्ट्रिणः ||
२४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सिंहार्दितं महारण्ये यथा गजकुलं तथा ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सिंहाविव दुराधर्षौ गदाय़ुद्धे परन्तपौ |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
सिंहाविव सुसङ्क्रुद्धौ परस्परजिगीषय़ा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहासनस्थं पार्थिवमाससाद; वैचित्रवीर्यं प्राञ्जलिः सूतपुत्रः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
सिंहासनस्थं युवतीसहाय़ं; क्रीडन्तमक्षैर्गिरिराजमूर्ध्नि ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
सिंहासनस्थो नृपतिर्धृतराष्ट्रो महावलः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहासनानि भूरीणि विचित्राणि च भेजिरे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सिंहास्यं च यथा प्राप्य न जीवन्ति मृगाः क्वचित् |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहिका सुषुवे पुत्रं राहुं चन्द्रार्कमर्दनम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सिंहिकातनय़ांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः ||
१०८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सङ्गरमद्भुतम् |
१२ क