chevron_left  साङ्ख्यदर्शनमेतावदुक्तंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्यदर्शनमेतावदुक्तं ते नृपसत्तम |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
साङ्ख्यन्याय़ेन संय़ुक्तं यदेतत्कीर्तितं मय़ा ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
साङ्ख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
साङ्ख्ययोगकृतं तेन पञ्चरात्रानुशव्दितम् ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्ख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्ययोगे च कुशला वुध्यन्ते परमैषिणः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
साङ्ख्ययोगौ पृथग्वालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्ययोगौ मय़ा प्रोक्तौ शास्त्रद्वय़निदर्शनात् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
साङ्ख्यशूराश्च वहवो योगशूरास्तथापरे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञा गच्छन्ति परमां गतिम् |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा देहं प्रजाकृतम् |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्ख्याः सर्वे साङ्ख्यधर्मे रताश्च; तद्वद्योगा योगधर्मे रताश्च |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्याः सह प्रकृत्या तु निस्तत्त्वः पञ्चविंशकः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
साङ्ख्याः साङ्ख्यं प्रशंसन्ति योगा योगं द्विजातय़ः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्यानां तु परं तत्र यथावदनुवर्णितम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
साङ्ख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् |
८५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धय़े सर्वकर्मणाम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्ये च पठ्यते शास्त्रे नामभिर्वहुधात्मकः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
साङ्ख्ये च योगशास्त्रे च आय़ुर्वेदे तथैव च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
युधिष्ठिर उवाच
साङ्ख्ये त्विदानीं कार्त्स्न्येन विधिं प्रव्रूहि पृच्छते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्ये योगे च निय़ता ये च धर्माः सनातनाः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
युधिष्ठिर उवाच
साङ्ख्ये योगे च मे तात विशेषं वक्तुमर्हसि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
शुक उवाच
साङ्ख्ये वा यदि वा योगे एतत्पृष्टोऽभिधत्स्व मे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्ये विधिविधानज्ञा नित्यं साङ्ख्यपथे रताः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
साङ्ख्येन विधिना चैव योगेन च यथाक्रमम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
साङ्गदः सतनुत्राणः सशरी रथिनां वरः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
साङ्गदैः सतनुत्रैश्च सासिप्रासपरश्वधैः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
साङ्गदौ जलसन्धस्य चिच्छेद प्रहसन्निव ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
धृतराष्ट्र उवाच
साङ्गा वेदा यथान्याय़ं येनाधीता महात्मना |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्गांश्च चतुरो वेदांस्तमस्मि मनसा गतः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
साङ्गांश्च चतुरो वेदान्योऽधीय़ीत द्विजर्षभः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
साङ्गांश्च चतुरो वेदान्सम्यगाख्यानपञ्चमान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
साङ्गानावर्तय़न्वेदांस्तपस्तेपे सुदुश्चरम् ||
४७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
साङ्गानावर्तय़न्वेदान्कमण्डलुगणित्रधृक् ||
८१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
साङ्गुलित्रैर्भुजाग्रैश्च विप्रविद्धैरलङ्कृतैः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
साङ्गोपनिषदं शास्त्रं स्थापय़ित्वा वृहस्पतौ ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
साङ्गोपनिषदान्वेदाञ्जपन्नेव महाय़शाः ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
साङ्गोपनिषदान्वेदानधीते द्विजसत्तमः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्गोपनिषदान्वेदान्विप्राश्चाधीय़ते तदा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्गोपाङ्गानपि यदि पञ्च वेदानधीय़ते |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
साङ्ग्रामिकं ते यदुपार्जनीय़ं; सर्वं समग्रं कुरु तन्नरेन्द्र ||
३६ ग
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
साचिन्तय़त्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
साञ्जलिं तु ततः कृत्वा पुण्डरीकनिभेक्षणा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
साञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तगः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
सातत्यं च प्रसङ्गस्य वर्णय़ेय़ं यथातथम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
सात्त्विकं मार्गमास्थाय़ पश्येदात्मानमात्मना ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
सात्त्विकं रूपमेवं तु लाघवं साधुसंमितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः ||
६४ ख