अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
साम्ना प्रसाद्यते कश्चिद्दानेन च तथापरः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
साम्ना भेदेन दानेन दण्डेन वलिकर्मणा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
साम्ना ये सर्वभूतानि गच्छन्ति गतमत्सराः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
साम्ना वापि प्रदाने वा ज्याय़ः किं भवतो मतम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
साम्ना षडग्नय़ो यस्मिंश्चीय़न्ते संशितव्रतैः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
साम्ना सत्येन युक्तेन वचसाश्वासय़ प्रभो ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
साम्नाभिवदतां चापि शान्तय़े भरतर्षभ ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
साम्नामृचां च नादेन स्त्रीणां च रुदितस्वनैः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
साम्नैव तु यथा भीम मोक्षय़ेथाः सुय़ोधनम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत्कर्म चास्मै प्रय़ोजय़ेत् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
साम्नैवावर्तने पूर्वं प्रय़तेथास्तथो युधि ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
साम्पराय़े सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽय़मागतः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
साम्प्रतं च मतो मेऽसि व्राह्मणो नात्र संशय़ः ||
१० ग
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
साम्प्रतं चैव यत्कार्यं तच्च क्षिप्रमकालिकम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
साम्यं समस्तु ते सौख्यं युवय़ोर्वर्धतां क्रतुः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
साम्यमुत्पाद्य मनसो मनस्येव मनो दधत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
साम्यमेकत्वमाय़ातो यादृशस्तादृशस्त्वहम् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
साम्राज्यं तु तवेच्छन्तो वय़ं योत्स्यामहे परैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
साम्राज्यं तेन सम्प्राप्तं नाराय़णवरात्पुरा ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः |
५१ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
साम्वं च निहतं दृष्ट्वा चारुदेष्णं च माधवः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
साम्वः शरसहस्रेण रथमस्याभ्यवर्षत ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
साम्वः ससूतं सरथं भुजाभ्यां; दुःशासनं शास्तु वलात्प्रमथ्य |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
साम्वप्रभृतय़श्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
साम्वश्च चारुदेष्णश्च सारणोऽथ गदस्तथा ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
साम्वाख्यो वह्वृचो राजन्वक्तुं समुपचक्रमे ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः ||
१०७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सारङ्ग इव घर्मार्तः कामं विलप शुष्य च |
९७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः ||
१०९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्वारकागतान् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
सारणश्च महावाहुर्गदश्च विदुषां वरः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सारणेन च वीरेण निशठेनोल्मुकेन च |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
सारतो जगतः कृत्स्नादतिरिक्तो जनार्दनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सारथिं कुरुवृद्धस्य पातय़ामास साय़कैः ||
१०५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च गदा गुर्वी ममर्द भरतर्षभ ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च त्रिभिर्वाणैः सुशितै रणमूर्धनि ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च त्रिभिर्वाणैराजघान परन्तपः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च त्रिभिर्वाणैराजघान यतव्रतः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च त्रिभिर्वाणैस्त्रिभिरेव त्रिवेणुकम् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च महाराज त्रिभिरेव समार्दय़त् |
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च रथात्तूर्णं पातय़ामास पत्रिणा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च रथी राजन्कुञ्जरांश्च महारणे |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च शतेनैव भारद्वाजस्य पश्यतः ||
१२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च शरेणास्य भृशं मर्मण्यताडय़त् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च सुसङ्क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
सारथिं च हय़ांश्चैव शरैर्निन्ये यमक्षय़म् |
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
सारथिं चतुरश्चाश्वान्कर्णो विव्याध साय़कैः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
सारथिं चतुरश्चाश्वान्वाणैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सारथिं चाव्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
सारथिं चास्य तरसा प्राहिणोद्यमसादनम् |
४० क