कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
शिरः कर्णस्य सोत्सेधमिषुः सोऽपाहरद्द्रुतम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
शिरः काय़ानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शिरः काय़ेन सन्धाय़ प्रेक्षमाणा विचेतसः |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
शिरः पशोस्ते दास्यन्ति भागं यज्ञेषु मानवाः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽव्रवीत् ||
६४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
शिरः पादेन चास्याहमधिष्ठास्यामि भूतले ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
शिरः प्रच्यावय़ामास फलं पक्वं तरोरिव |
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
शिरः प्रच्यावय़ामास स रथात्प्रापतद्भुवि ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शिरः प्रध्वंसय़ामास वक्षस्याक्रम्य कुञ्जरः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
शिरःकपाले चास्यैव भुञ्जतः पितुरद्य मे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
शिरःसु च निगृह्यैनान्योधय़ामास पाण्डवः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
शिरःस्नातश्च तैलेन नाङ्गं किञ्चिदुपस्पृशेत् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
शिरःस्नातोऽथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च |
११९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शिरश्च तत्पूर्णशशिप्रभाननं; सरोषताम्राय़तनेत्रमुन्नसम् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
शिरश्च राजसिंहस्य पादेन समलोडय़त् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
शिरश्चिच्छेद गच्छन्त्यास्तामपश्यत्सुरेश्वरः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शिरश्चिच्छेद प्रहसंस्तप्तकुण्डलभूषणम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
शिरश्चिच्छेद भल्लेन क्षिप्रकारी वृकोदरः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
शिरश्चिच्छेद समरे शरेण नतपर्वणा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शिरश्चिच्छेद सहसा यन्तुर्भरतसत्तम ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
शिरश्छेत्स्यति सङ्क्रुद्धः शत्रुर्नालक्षितो भुवि ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शिरसस्तस्य विभ्रष्टः पपात च वराङ्कुशः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
शिरसा चार्घ्यमादाय़ गुरुपुत्रं समभ्यगात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
नारद उवाच
शिरसा चार्घ्यमादाय़ शुचिः प्रय़तमानसः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
शिरसा ते दिवं व्याप्तं वाहुभ्यां पृथिवी धृता |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शिरसा धारय़न्दीप्तां तपनीय़मय़ीं स्रजम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
शिरसा प्रणतश्चापि हरेद्वलिमतन्द्रितः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमर्हसि |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
शिरसा प्रतिजग्राह भूय़स्तमभिवाद्य च ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
राम उवाच
शिरसा वन्दनार्होऽपि ग्रहीष्यति गिरा मम ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
शिरसा वन्दनीय़ं तमभिवन्द्य जगत्पतिम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
शिरसा वन्दनीय़ं तमवन्दत स पार्थिवः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत ||
४५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता उमाभवत् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शिरसां च महाराज पततां वसुधातले |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
शिरसां पततां चैव कुण्डलोष्णीषधारिणाम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
शिरसां पततां राजञ्शव्दोऽभूत्पृथिवीतले |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
शिरसां पात्यमानानामन्तरा निशितैः शरैः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
शिरसाभिवदेथास्त्वं मम नाम प्रकीर्तय़न् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
शिरसीव जिघांसन्तो जरासन्धजिघांसवः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
शिरस्तस्य शिलाय़ां च तूलराशाविवापतत् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
रेणुको उवाच
शिरस्तावत्प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
शिरस्तु पातु ते वह्निर्भास्करः सर्वमेव तु ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शिरस्ते पातय़िष्यामि गदय़ा वज्रकल्पय़ा ||
१०३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
शिरस्ते पातय़िष्यामि गदय़ा वज्रकल्पय़ा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं; धनुः शरांश्चापि विषाहिकल्पान् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शिरस्त्राणक्षुद्रमत्स्यां युगान्ते कालसम्भृताम् |
४८ क