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शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
सास्य गूहति पापानि वासो गुह्यमिव स्त्रिय़ाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
सास्य पूर्णाहुतिर्होत्रे समृद्धा सर्वकामधुक् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
सास्य वेदी तथा यज्ञे नित्यं वेदास्त्रय़ोऽग्नय़ः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सास्य हृद्या वभूवाथ तस्मात्तां वुभुजे सदा ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
साहं केशग्रहं प्राप्ता परिक्लिष्टा सभां गता |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ६
पुलोमो उवाच
साहं तव सुतस्यास्य तेजसा परिमोक्षिता |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
साहं तस्मिन्कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे |
१८४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्वं व्रह्मणः पदम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
साहं त्वामभिषेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
साहं त्वामभिसम्प्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
साहं दासत्वमापन्ना न शान्तिमवशा लभे ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
साहं दुःखान्विता भीरु पतिपुत्रविनाकृता |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वय़ि स्थिते |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
साहं नात्मफलार्थं वै वासुदेवमचूचुदम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
साहं पित्रा च निकृता श्वशुरैश्च परन्तप |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय १७
राक्षस्यु उवाच
साहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तय़न्त्यनिशं नृप |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
साहं प्रसादय़े कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
साहं भीष्मविनाशाय़ तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २५०
वैशम्पाय़न उवाच
साहं वृणे पञ्च जनान्पतित्वे; ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
साहं वै पङ्कजे जाता सूर्यरश्मिविवोधिते |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ३
द्रौपद्यु उवाच
साहं व्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
साहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
साहं सर्वाधमा लोके स्त्रीणां भरतसत्तम |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
साहदेविस्तु तं ज्ञात्वा भ्रातृभिर्विमुखीकृतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
द्रौपद्यु उवाच
साहमद्य सभामध्ये दृश्यामि कुरुसंसदि ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
साहमद्य सुदेष्णाय़ाः पुरः पश्चाच्च गामिनी |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
साहमन्तःपुरे राज्ञः कुन्तिभोजपुरस्कृता |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ८
द्रौपद्यु उवाच
साहमभ्यागता देवि सुदेष्णे त्वन्निवेशनम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
साहमामन्त्र्य गाङ्गेय़ं समरेष्वनिवर्तिनम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
साहमासनदानेन वागातिथ्येन चार्चिता |
१९० क
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
साहमेतद्विजानन्ती तोषय़िष्ये द्विजोत्तमम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
साहमेतानि कर्माणि राज्यदुःखानि मैथिल |
१६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
साहमेवंविधं दुःखं सहेऽद्य पुरुषोत्तम |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
साहमेवङ्गुणेष्वेव दानवेष्ववसं पुरा |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
साहसं कृतवांस्त्वं तु ह्यनुक्रोशान्नृपोत्तम ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
साहसं चात्मनातीव चरन्ती नाववुध्यते ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
साहसं वत भद्रं ते देवानामपि चाप्रिय़म् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
साहसप्रकृतिर्यत्र कुरुते किञ्चिदुल्वणम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
द्रोण उवाच
साहसाद्यदि वा मोहात्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
साहसाद्यदि वा मोहाद्भीम पापमिदं कृतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रिय़ास्तथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
साहसेषु च सन्तिष्ठन्निह शैले वृकोदरः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते ||
१३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
जनमेजय़ उवाच
साहाय़्यं धार्तराष्ट्रस्य न च कर्तास्मि केशव |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
साहाय़्यकारी समरे पार्षतस्य महात्मनः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
साहाय़्यमस्मिन्समरे भवान्नौ कर्तुमर्हति |
१३७ क