chevron_left  साहाय़्यमुभय़ोरेवarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ७
कृष्ण उवाच
साहाय़्यमुभय़ोरेव करिष्यामि सुय़ोधन ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
साहाय़्यमृषय़ो देवा गन्धर्वाश्च ददुः किल ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
साहाय़्ये विनिय़ोक्ष्यामि नास्ति मेऽन्यो हि तत्समः ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
साहाय़्येऽस्मि स्थितः पार्थ योधय़िष्यामि राक्षसम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
साह्यं तथा महावाहो दत्तमस्माकमच्युत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
साह्यार्थं च हि ते वीराः सम्भूता भुवि दानवाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
आस्तीक उवाच
साय़ं प्रातः सुप्रसन्नात्मरूपा; लोके विप्रा मानवाश्चेतरेऽपि |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
साय़ं प्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातर्जपन्सन्ध्यां तिष्ठेत्पूर्वां तथापराम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातर्नमस्येच्च गास्ततः पुष्टिमाप्नुय़ात् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ं प्रातश्च भगवान्दृश्यते हव्यवाहनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातश्च भुञ्जीत नान्तराले समाहितः ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातश्च विप्राणां प्रदिष्टमभिवादनम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातश्च वृद्धानां शृणुय़ात्पुष्कला गिरः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
साय़ं प्रातश्च सततं होमकाले महामते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
वसिष्ठ उवाच
साय़ं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्शुनःसखः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
साय़ं साय़ं द्विजान्विप्रो न चाकम्पत जाजलिः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
साय़ं साय़ं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
साय़का इव तीक्ष्णाग्राः प्रय़ुक्ता दृढधन्विभिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
साय़कांश्चैव विविधानश्वत्थाम्नि मुमोच ह ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
साय़कानां चतुःषष्ट्या क्षिप्रकारी महावलः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
साय़कानां ततः पार्थस्त्रिषष्ट्या प्रत्यविध्यत |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
साय़कानां नवत्या वै सहदेवमवाकिरत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
साय़कानां शतेनैव सर्वमर्मस्वताडय़त् ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
साय़कानामशीत्या तु विव्याधोरसि भारत ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
साय़कान्व्यसृजच्चापि वीरो रुक्मरथं प्रति ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
साय़काश्चैव दृश्यन्ते निश्चरन्तः समन्ततः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
साय़केन सुपीतेन तीक्ष्णेन निशितेन च |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
साय़कैर्दशभी राजन्भ्रुवोर्मध्ये समार्दय़त् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
साय़कैर्नवभिर्वीरस्त्वरमाणो धनञ्जय़ः ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
साय़कैर्निशितै राजन्नाजघान पृथक्पृथक् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
साय़कैर्वहुसाहस्रैः कृतप्रतिकृतेप्सय़ा ||
६८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
साय़कैर्वारितश्चापि वर्षमाणो महात्मना ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
साय़कौघप्रतिच्छन्नं चक्रतुः खमजिह्मगैः |
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
साय़कौघेन वलवान्क्षिप्रकारी महावलः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
साय़म्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान्वहून् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
साय़म्प्रातरुपातिष्ठन्सुमृष्टमणिकुण्डलाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
साय़म्प्रातर्विभज्यान्नं स्वकुटुम्वे यथाविधि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
साय़ाह्ने चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यवादिनः |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
साय़ाह्ने न्यपतद्भूमौ धार्तराष्ट्रान्विषादय़न् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ाह्ने पुनरेष्यामो रोचतां ते जनार्दन ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
साय़ाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन्भविष्यसि ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ाह्ने स महीपालस्ततो गङ्गामुपेत्य ह |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
साय़ाह्ने सैन्धवं हत्वा राज्ञा पार्थः समेत्य च |
५ क
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ुधं वद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिन्दमम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
साय़ुधः सपताकश्च सशक्तिः कणय़ष्टिमान् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ुधा वद्धनिष्ट्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
साय़ुधा वद्धनिस्त्रिंशा यक्षा दशशताय़ुताः |
२८ क