वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
आप्याय़त महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
आप्याय़न्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
आप्लवन्त गतैः सत्त्वैर्मत्स्याः शतसहस्रशः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लाव्य शुचय़ः सर्वे स्रग्विणः शुक्लवाससः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
आप्लावय़त गात्राणि तीव्रमास्थाय़ वै तपः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
आप्लुतः स ततो यानं सुतसोमस्य भास्वरम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुतः सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गाय़ां व्यमुच्यत ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुतः सलिले शीते तस्माच्चापि जगाम ह |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
आप्लुतः सहसा यानं नन्दकस्य महात्मनः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
आप्लुतः साधिवासेन जलेन च सुगन्धिना ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
आप्लुतश्च ततो यानं चित्रसेनस्य धन्विनः ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुताङ्गी सुवसना सर्वाभरणभूषिता ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुतो भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उत्तमे ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
आप्लुत्य देवा वसवः समेत्य च महानदीम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
आप्लुत्य पाण्डवानीकं पुनर्युद्धमरोचय़न् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आप्लुत्य रथिनः कांश्चित्परामृश्य महावलः |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुत्य वहुशो हृष्टस्तेषु तीर्थेषु लाङ्गली |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुत्य सलिले चापि पूजय़ामास वै द्विजान् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
आभाति पद्मवद्वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव च |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिव; अथो कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
आभाषमाणस्तौ वीरावुभौ माधवफल्गुनौ ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
आभाषमाणां स्वां पत्नीं किं मां न प्रतिभाषसे ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
आभाषमाणोऽनुय़यौ मुहूर्तं; सम्पूजय़ंस्तत्र गुरून्महात्मा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
आभाषितश्च मधुरं प्रतिभाषेत मानवान् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
आभाष्य चैनं मधुरमभि नृत्यन्नभीतवत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
आभास्वरा गन्धपा दृष्टिपाश्च; वाचा विरुद्धाश्च मनोविरुद्धाः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
भीष्म उवाच
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात्पृच्छामि ते द्विज |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
आभिर्गाथाभिरव्यग्रः प्रश्नं प्रतिजगाद ह ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
आभिषेचनिकं द्रव्यं गृहीत्वा देवतागणाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
आभिषेचनिकं भाण्डं सर्वसम्भारसम्भृतम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
आभिषेचनिकं यत्ते रामार्थमुपकल्पितम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
आभीरवः सुवलिनस्तद्वलं सर्वपारगम् ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
आभीरा मन्त्रय़ामासुः समेत्याशुभदर्शनाः ||
४५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
आभीरैरनुसृत्याजौ हृताः पञ्चनदालय़ैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
आभ्यन्तरं भय़ं रक्ष्यं सुरक्ष्यं वाह्यतो भय़म् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
युधिष्ठिर उवाच
आभ्यन्तरे प्रकुपिते वाह्ये चोपनिपीडिते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
आभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां यो वा स्यात्प्रज्ञय़ाधिकः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
आभ्यां फलसहस्रे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७
कृष्ण उवाच
आभ्यामन्यतरं पार्थ यत्ते हृद्यतरं मतम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
आभ्यामर्थाय़ सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वय़म् |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
आभ्यो मां भगवान्पातु वृत्तिरासां विधीय़ताम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
आमः स्यात्पक्वसङ्काशो न च शीर्येत कस्यचित् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
आमथ्य मतिमन्थेन ज्ञानोदधिमनुत्तमम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्रणार्थं दूतांस्त्वं प्रेषय़स्वाशुगान्द्रुतम् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
आमन्त्रिता ततोऽगच्छद्रुचिरङ्गपतेर्गृहान् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
आमन्त्र्य केशवं यातो वृष्णिभिः सहितः प्रभुः ||
१ ख