chevron_left  सुखश्रव्यतय़ाarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २०६
युधिष्ठिर उवाच
सुखश्रव्यतय़ा विद्वन्मुहूर्तमिव मे गतम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
सुखसङ्गेन वध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
भीम उवाच
सुखसुप्तान्वने भ्रातृन्मातरं चैव राक्षसि |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सुखस्य च परं तत्त्वं विज्ञाय़ वदतां वर ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
सुखस्यानन्तरं दुःखं स जीवोऽप्यधिगच्छति ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
सुखस्यान्तः सदा दुःखं दुःखस्यान्तः सदा सुखम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सुखस्योपनिषत्स्वर्गः स्वर्गस्योपनिषच्छमः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
सुखां च रजनीं पृष्ट्वा गाङ्गेय़ं रथिनां वरम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
विभाण्डक उवाच
सुखाच्च लोकाच्च निपातय़न्ति; तान्युग्रकर्माणि मुनीन्वनेषु ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
सुखात्त्वं दुःखमापन्नः पुनरापत्स्यसे सुखम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
सुखात्सञ्जाय़ते दुःखमेवमेतत्पुनः पुनः |
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
कीट उवाच
सुखात्सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
सुखात्सुखतरप्राप्तिमाप्नुते मतिमान्नरः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
सुखात्सुखतरो वासो भविष्यति न संशय़ः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
सुखात्सुखमनुप्राप्ता ह्रदाद्ध्रदमिवागता ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
सुखादेव परं दुःखं दुःखादन्यत्परं सुखम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
सुखाद्वहुतरं दुःखं जीविते नात्र संशय़ः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मय़ानघ ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
सुखानि चानुभूय़न्ते मनश्च न विहन्यते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
सुखारोहणसोपानान्महासनपरिच्छदान् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखारोहणसोपानैर्महासनपरिच्छदैः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा सुखं त्यजेत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखार्हं दुःखितं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखार्हः स हि राजर्षिर्न सुखं तन्महावनम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
सुखार्हां दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
सुखार्हाः परमं दुःखं प्राप्नुवन्त्यपराजिताः ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय १
महाभारत कथा
सुखासीनं ततस्तं तु विश्रान्तमुपलक्ष्य च |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
सुखितं दुःखितं वापि ननु वोद्धव्यमात्मना ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनोऽपरे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
सुखितैर्दुःखितैर्वापि दृश्योऽप्यस्य विनिर्णय़ः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
सुखिनः क्षत्रिय़ाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशय़ः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला |
७ क
वन पर्व
अध्याय १३८
लोमश उवाच
सुखिनो वै नरा येषां जात्या पुत्रो न विद्यते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखी परस्य यो दुःखे न जातु स सुखी भवेत् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सुखी भव निरावाधः स्वस्थचेता निरामय़ः ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सुखी सोऽहमवाप्तार्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
सुखे धास्यसि नः सर्वान्कुवेर इव नैरृतान् ||
२५ ख