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उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
सुखे भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दुःखिताः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
सुखे वा यदि वा दुःखे वर्तमानो विचक्षणः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
सुखे सौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तकः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखेन ते निशा कच्चिद्व्युष्टा वुद्धिमतां वर |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
सुखेन तेन संय़ुक्तो रंस्यते ध्यानकर्मणि |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखेन धर्मं श्रीमन्तश्चरन्ति शुचिवाससः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
युधिष्ठिर उवाच
सुखेन रजनी व्युष्टा कच्चित्ते मधुसूदन |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
सुखेन व्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
सुखेन संय़ास्यथ सिद्धसङ्ख्यां; मा वो भय़ं भूद्विमलाः स्थ सर्वे ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
सुखेनागमनं कच्चिद्भगवन्कुरुजाङ्गले |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सुखेनापोह्यते दुःखं भास्करेण तमो यथा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
सुखेनार्थान्सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्नुय़ात् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सुखेष्वभिरतो योगी दुःखानामविजानकः ||
१२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
सुखैषिणः कर्म कुर्वन्ति पार्था; धर्मादहीनं यच्च लोकस्य पथ्यम् ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
सुखोचितः सुखार्हश्च शेते पांसुषु माधव ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोचितमदुःखार्हं दुरात्मा ससुहृद्गणः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोचितमदुःखार्हं सुकुमारं महारथम् |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
सुखोचितो दुःखशय़्यां वनेषु; दीर्घं कालं नकुलो यामशेत |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद्भरतर्षभ |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
सुखोदय़ाय़ तत्सर्वं श्रेय़से च तवानघ ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
सुखोपचय़मव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवत्तय़ा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
सुखोपविष्ट आचष्ट दमय़न्त्या यथातथम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तं; युधिष्ठिरो व्राह्मणमित्युवाच |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुखस्थितम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोपविष्टं विश्रान्तमथैनं विदुरोऽव्रवीत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं; पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे |
८ क
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं; सूतानुपादाय़ रथांश्च सर्वान् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
सुखोषितास्तां रजनीं प्रातः सर्वे कृताह्निकाः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सुखोषितास्ते रजनीं हृष्टा युद्धाय़ निर्ययुः ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
सुगतिं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
सुगन्धचित्रास्तरणोपपन्नं; दद्यान्नरो यः शय़नं द्विजाय़ |
४० क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सुगन्धां शतकुम्भां च पञ्चय़ज्ञां च भारत |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
सुगुप्तश्च चरत्वेष यथाशास्त्रं युधिष्ठिर ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
सुगूढजत्रु विपुलं हारनिष्कनिषेवितम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
सुगृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवः कपिभिः सार्धं परिवार्य ततः स्थितः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवः प्राप्य किष्किन्धां ननादौघनिभस्वनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवः प्रेषय़ामास सचिवं वानरं तय़ोः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवजाम्ववन्तौ च हनूमानङ्गदस्तथा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवमभिगच्छस्व स ते साह्यं करिष्यति ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवमभिगम्येदं त्वरिता वाक्यमव्रुवन् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवश्चापि वैदेह्याः पुनरानय़नं नृप ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
सुग्रीवसैन्यप्रमुखैर्वराश्वै; र्मनोजवैः काञ्चनभूषिताङ्गैः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवस्य तदा मालां हनूमान्कण्ठ आसजत् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
सुग्रीवस्य तु शङ्काभूत्प्रणिधिः स्यादिति स्म ह ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
सुग्रीवेणाभवत्प्रीतिरनिलस्याग्निना यथा ||
२६ ख