उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
सुता द्रुपदराजस्य स्वसिताय़तमूर्धजा |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सुता धृतव्रता साध्वी निय़ता व्रह्मचारिणी ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
सुता मे पञ्चभिर्वीरैः पञ्च जाता महारथाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रिय़ार्थं महीपते ||
१७ ग
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
सुतामिव महेन्द्रस्य पुरस्कृत्योपतस्थिरे ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
सुतार्थं स्थापिता ह्यापस्तपसा चैव सम्भृताः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
देव्यु उवाच
सुतार्थेनोपरुद्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिय़े ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
सुतावनीध्रस्य हरस्य भार्या; दिवो भुवश्चापि कक्ष्यानुरूपा |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सुताश्च सर्वे द्रुपदस्य राज्ञो; भीमार्जुनौ माद्रवतीसुतौ च |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सुतास्तव महाराज त्रिंशत्त्रिदशसंनिभाः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
शर्मिष्ठो उवाच
सुताहं स्तूय़मानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
सुताहं स्तूय़मानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सुताय़ां नागराजस्य जातः पार्थेन धीमता ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सुतीक्ष्णं चोदय़न्नश्वान्प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं; युय़ुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
सुतीर्थवनतोय़ासु तथा गिरिनदीषु च ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
सुते दशार्णाधिपतेः सुदाम्नश्चारुदर्शने ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम् |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
सुतेन सोमेन विमिश्रितोदां; ततः पय़ोष्णीं प्रति स ह्युवास ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
सुतेषु राजन्सर्वेषु दीनेष्वभ्यधिका कृपा ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
सुतेय़ं तस्य कल्याणी दमय़न्तीति विश्रुता ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सुतेय़ं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन्धृतराष्ट्रजैः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राय़ाः परन्तपौ ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
सुदक्षिणं च काम्वोजं कृतवर्माणमेव च ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणं तु काम्वोजं मोघसङ्कल्पविक्रमम् |
६७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणं तु राजेन्द्र काम्वोजानां महारथम् |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणः स सङ्ग्रामे निहतः सव्यसाचिना ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सुदक्षिणश्च काम्वोजस्त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
सुदक्षिणश्च काम्वोजो दृढधन्वा च कौरवः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
सुदक्षिणश्च काम्वोजो यवनैश्च शकैस्तथा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
दुर्योधन उवाच
सुदक्षिणश्च निहतः स च राजा श्रुताय़ुधः |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
सुदक्षिणस्तं युय़ुजे श्वेतैः काम्वोजजैर्हय़ैः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
सुदक्षिणस्तु काम्वोजो रथ एकगुणो मतः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणस्तु समरे कार्ष्णिं विव्याध पञ्चभिः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणस्तु समरे साहदेविं महारथम् |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणादवरजं काम्वोजं ददृशुर्हतम् |
१०६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणादवरजः शरवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ||
१०३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
सुदक्षिणो मधुरवागनसूय़ुर्जितेन्द्रिय़ः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणो महाराज काम्वोजः प्रत्यवारय़त् ||
१४ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सुदक्षिणो हतो यत्र जलसन्धश्च कौरवः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
सुदर्शः सर्वभूतानामासीत्सोम इवापरः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
सुदर्शः सर्ववर्णानां नय़ापनय़वित्तथा ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
सुदर्शः स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रिय़ः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनं चास्य रराज शौरे; स्तच्चक्रपद्मं सुभुजोरुनालम् |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनं निहत्याजौ यन्तारमिदमव्रवीत् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं ते कुरुनन्दन |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनः सात्यकिमापतन्तं; न्यवारय़द्राजवरः प्रसह्य ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनमदृश्यं तं शरैश्चक्रे हसन्निव ||
४७ ख