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अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
धर्म इत्येव सम्वुद्धास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म इत्येष नृपते प्राज्ञेनामितवुद्धिना ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
धर्म एको मनुष्याणां सहाय़ः पारलौकिकः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म एतानारुजति यथा नद्यनुकूलजान् ||
४९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
धर्म एव कृतः श्रेय़ानिह लोके परत्र च |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थितः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्म एव प्लवो नान्यः स्वर्गं द्रौपदि गच्छताम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्म एव मनः कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम् ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
धर्म एव रतिस्तेषामाचार्योपासनाद्भवेत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
धर्म एव सदा नॄणामिह राजन्प्रशस्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
धर्मं करोमीति करोत्यधर्म; मधर्मकामश्च करोति धर्मम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
धर्मं कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं; महाप्रतापः सवितेव भाति |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
धर्मं कृत्वा महीं रक्षन्स्वर्गे स्थानमवाप्स्यसि ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय २५२
धौम्य उवाच
धर्मं क्षत्रस्य पौराणमवेक्षस्व जय़द्रथ ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं च पितृवंशं च मातृवंशं च मानिनी |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
धर्मं चरत माधर्ममिति तस्य वचः किल |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
धर्मं चरत यत्नेन तथाधर्मान्निवर्तत |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मं चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं चाग्र्यं स जग्राह सरहस्यं ससङ्ग्रहम् |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मं चाधर्मरूपेण कश्चिदप्राकृतश्चरन् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
धर्मं चाधर्मसङ्काशं शोचन्निव करोति सः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं चार्थं च कामं च यथावद्वदतां वर |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालय़न्प्रव्रवीम्यहम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
धर्मं तु यः प्रवृणीते स वुद्धः; कामे गृद्धो हीय़तेऽर्थानुरोधात् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
धर्मं तु श्रोतुकामेन हृतं न क्रोद्धुमर्हसि ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
धर्मं ते सम्प्रवक्ष्यामि पुराणमृषिसंस्तुतम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मं ते ह्याचरन्कृष्णे तद्धि धर्मसनातनम् ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
द्रौपद्यु उवाच
धर्मं त्वेकं परमं प्राह लोके; स नः शमं धास्यति गोप्यमानः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ तन्निवोध नराधिप ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ मुनय़स्तत्त्वदर्शिनः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
धर्मं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्गं यान्ति मनीषिणः ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
धर्मं पप्रच्छुरासीनमादिकाले प्रजापतिम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
धर्मं परमकं कुर्यां को हि मार्गो भवेद्द्विज ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
धर्मं पाञ्चनदं दृष्ट्वा धिगित्याह पितामहः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
धर्मं पुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौ हि हिमातपौ |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
धर्मं पुत्राग्रतः कृत्वा किंनिमित्तं हि जीवसि ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
धर्मं पुरस्कृत्य सदा सर्वलोकाधिपो भव |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
धर्मं पुराणमुपजीवन्ति सन्तो; मद्रानृते पञ्चनदांश्च जिह्मान् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं पूर्वं धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अकृतव्रण उवाच
धर्मं प्रति वचो व्रूय़ाः शृणु चेदं वचो मम ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मं प्रह्राद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
धर्मं प्राप्य न्याय़वृत्तिमवलीय़ान्न विन्दति ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
धर्मं मनसि संस्थाप्य व्राह्मणांस्ताः समभ्ययुः |
५ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
धर्मं यो वाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म तत् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
धर्मं वदेद्व्याहृतं तत्तृतीय़ं; प्रिय़ं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
धर्मं वाय़ुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा |
७ क