शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
हत्वा वा समरे पार्थान्स्फीतं राज्यमवाप्नुहि |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा विंशतिसाहस्रान्क्षत्रिय़ानरिमर्दनः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
हत्वा विंशतिसाहस्रान्पाञ्चालानां रथव्रजान् |
८३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा शतसहस्राणि योधानां निशितैः शरैः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्राय़च्छंस्तिलशः कृतम् ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
हत्वा श्रुताय़ुधं वीरं जगतीमन्वपद्यत ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा षष्टिसहस्राणि निवातकवचान्रणे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
हत्वा संशप्तकव्रातान्दिव्यैरस्त्रैः कपिध्वजः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
हत्वा सङ्ख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
हत्वा सत्त्वानि खादन्ति तान्कथं न विगर्हसे |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
हत्वा सप्तभिरेकैकं छत्रं चिच्छेद पत्रिणा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
हत्वा सम्भक्षय़िष्यामि सर्वैरनुचरैः सह |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
हत्वा सर्वाणि सैन्यानि प्राय़ात्सात्यकिरर्जुनम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
हत्वा सहस्रशो योधानर्जुनेन निपातितः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
हत्वा साध्वीं च नारीं च व्यसनित्वाच्च शासिताम् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
हत्वा सुदुर्जय़ं कर्णं त्वमद्य निशितैः शरैः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा हिडिम्वं भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह |
९७ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
हत्वा हिडिम्वं सा प्रीतिर्ममासीद्वरवर्णिनि ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
हत्वा हय़ांस्ततो राजञ्शीघ्रास्त्रेण महाहवे |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
हत्वाधर्मेण राजानं धर्मात्मानं सुय़ोधनम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हत्वान्यं रथमास्थाय़ क्रुद्धो राधेय़मभ्ययात् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निवध्यते ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
हत्वाप्यनुशय़ो नित्यं परानपि जनार्दन |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वाप्रतिहतं सङ्ख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
हत्वारीन्निहतानां च सङ्ग्रामे तां गतिं व्रज ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव; भुञ्जीय़ भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
हत्वास्माकं पौरुषं हि दैवं पश्चात्करोति नः |
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
हत्वेमं पापकर्माणं गदय़ा रणमूर्धनि ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
हत्वैतद्दुर्वलं सैन्यं धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वैतान्मानुषान्सर्वानानय़स्व ममान्तिकम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
हत्वैनं पुनराय़ाति नागानन्यान्प्रहारिणः |
७२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
हतय़ोधं समुत्सृज्य भीतः शल्यः पलाय़ताम् ||
८९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
हतय़ोधस्ततो राजन्क्षीणकोशश्च भूमिपः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
हतय़ोधां नष्टरत्नां क्षीणवप्रां यथासुखम् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
हनिष्यति परान्राजन्पूर्ववैरमनुस्मरन् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
हनिष्यति रणे क्रुद्धो भीमः प्रहरतां वरः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
हनिष्यति रणे तं तं सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
हनिष्यति रणे भीष्मं न करिष्यति चेद्वचः ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
हनिष्यति रिपूंस्तुभ्यं महेन्द्रो दानवानिव ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
हनिष्यामि च तं वीरं स वा मां निहनिष्यति ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
हिडिम्व उवाच
हनिष्यामि ततः पश्चादिमां विप्रिय़कारिणीम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
हनिष्यामि रणे भीष्ममाहूय़ पुरुषर्षभम् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
हनिष्यामि रथेनाजौ तान्रिपून्वै दिवौकसः ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
हनिष्यामि सहामात्यं त्वामद्येति पुनः पुनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
हनिष्यामोऽर्जुनं सङ्ख्ये द्वैधीकृत्याद्य भारतीम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
राम उवाच
हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
हनिष्ये नरकं भौमं मुरं पीठं च दानवम् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
हनिष्ये रावणं सङ्ख्ये सगणं लोककण्टकम् ||
८१ ख