द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सुभद्रे मा शुचः पुत्रं पाञ्चाल्याश्वासय़ोत्तराम् |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
धृतराष्ट्र उवाच
सुभाषितैर्महाप्राज्ञ शोकोऽय़ं विगतो मम |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
सुभिक्षाश्चैव पाञ्चालाः श्रूय़न्ते शत्रुकर्शन |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
सुभीमः सिंहनादोऽभूद्योधानां तत्र सर्वशः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
सुभीमनानाविधशस्त्रपातै; र्घटोत्कचेनाभिहतं समन्तात् |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
सुभीमा घोररूपाश्च शूलपट्टिशपाणय़ः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुभूमिकं ततोऽगच्छत्सरस्वत्यास्तटे वरे ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुभूमिकेति विख्याता सरस्वत्यास्तटे वरे ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुभृशं च पराक्रान्ताः पाञ्चालानां निवारणे |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
सुभृशं तापय़ामास शक्रं सुरगणेश्वरम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
सुभृशं राज्यलुव्धेन पापेन गुरुघातिना ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
सुभ्राजस्तु त्रय़ः पुत्राः प्रजावन्तो वहुश्रुताः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्राजो भास्करश्चैव यौ तौ सूर्यानुय़ाय़िनौ |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
सुभ्रुं जटामण्डलचन्द्रमौलिं; व्याघ्राजिनं परिघं दण्डपाणिम् ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्रूः संहननो वाग्मी सौवीरीतनय़ास्त्रय़ः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्रूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्रूः सुदंष्ट्रः सुहनुः सुवाहुः सुमुखोऽकृशः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्रूनासाक्षिकेशान्तं सुकुमारनखत्वचम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुमङ्गला स्वस्तिमती वृद्धिकामा जय़प्रिय़ा ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सुमण्डलं पापजितं कृतवाननुसैनिकम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
मनुरु उवाच
सुमनोधूपदीपानां किं फलं व्रह्मवित्तम |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
मनुरु उवाच
सुमनोधूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सुमनोभिर्विचित्राभिरपूपैः कृसरेण च ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सुमनोभिश्च चित्राभिर्लाजैरुच्चावचैरपि |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
सुमनोमुखो दधिमुखः शङ्खो नन्दोपनन्दकौ |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
सुमनोमुखो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
सुमनोमोदकै रत्नैर्हिरण्येन च भूरिणा |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जय़ेत् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
सुमन्तुं च महाभागं वैशम्पाय़नमेव च |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्तुर्जैमिनिः पैलो व्यासशिष्यास्तथा वय़म् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
सुमन्त्रितं सुनीतं च न्याय़तश्चोपपादितम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुय़ुद्धं सुपलाय़ितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्त्रिते सुनीते च विधिवच्चोपपादिते |
२० क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृते सुविचारिते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्त्रितैर्नय़ैः सिद्धिस्तद्विदैः सह मन्त्रय़ेत् ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
सुमहच्चापि तत्कर्म यन्नरेण कृतं पुरा |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदय़ं प्रति ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सुमहत्कदनं कृत्वा हतः सात्यकिना रणे ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
सुमहत्कर्म पाण्डूनां स्थितः प्रिय़हिते नृपः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
सुमहत्कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
सुमहत्पाण्डुपुत्राणामाय़ान्त्येते हि कौरवाः ||
५७ ख