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अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
दृश्यते हि महाप्राज्ञ निय़तं वै स्वभावतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन्वसुमान्नरः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
दृश्यते हि हठाच्चैव दिष्टाच्चार्थस्य सन्ततिः ||
३१ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
दृश्यतोऽदृश्यतश्चैव वने तस्मिन्नृपस्य ह ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
शल्य उवाच
दृश्यन्त एते कार्ष्णेय़ाः पञ्च पञ्चाचला इव |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
दृश्यन्ते चापि वहवः सम्प्रसक्ता वहुश्रुताः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
दृश्यन्ते जरय़ा भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
दृश्यन्ते जरय़ा भग्ना नागा नागैरिवोत्तमैः ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन्दक्षाः प्राय़ो हितैषिणः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा व्रह्माहरात्रिषु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा व्रह्माहरात्रिषु ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
दृश्यन्ते नापि दृश्यन्ते कलेरन्ते पुनः पुनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
दृश्यन्ते नापि दृश्यन्ते वेदाः कलिय़ुगेऽखिलाः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाश्च स्वकर्मभिः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
दृश्यन्ते पुरुषा देव तन्मे शंसितुमर्हसि ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
मान्धातो उवाच
दृश्यन्ते मानवा लोके सर्ववर्णेषु दस्यवः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स व्राह्मण इति स्मृतः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
दृश्यन्ते रुधिराक्ताङ्गाः पुष्पिता इव किंशुकाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यन्ते वहवः पार्थ गन्धर्वाप्सरसां गणाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
दृश्यन्ते वहवो वैद्या व्याधिभिः समभिप्लुताः ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
दृश्यन्ते वहुधा राजन्वेष्टमानाः समन्ततः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
दृश्यन्ते वाहवश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
दृश्यन्ते वै महाराज शरैश्छन्नाः सहस्रशः ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यन्ते वै विकर्णे हि वैकृतानि वहून्यपि |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १३१
लोमश उवाच
दृश्यन्ते व्राह्मणै राजन्पुण्यवद्भिर्महात्मभिः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यन्ते शैलशृङ्गस्थास्तथा किम्पुरुषा नृप ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यन्ते शैलशृङ्गेषु पार्थ किम्पुरुषैः सह ||
८३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
दृश्यन्ते सन्त्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
दृश्यन्ते हि दुरात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यन्तेऽपि हि विद्यानां फलानि तपसां तथा ||
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यन्तेऽहरहो राजन्हृदय़ोद्वेगकारकाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
दृश्यमानेषु रक्षःसु भूतेषु विनदत्सु च ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष तिष्ठसि नैषध |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यादृश्या च भवति तत्र तत्र सरस्वती |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
दृश्यादृश्यानरिगणानुद्दिश्याचार्यनन्दनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
दृश्यादृश्ये ह्यनुगतमुभावेव महाद्युती ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यानि च प्रसन्नानि यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
दृषद्वती च कावेरी वङ्क्षुर्मन्दाकिनी तथा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
दृषद्वती पुण्यतमा तत्र ख्याता युधिष्ठिर |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
दृषद्वतीं चाप्यवगाह्य सुव्रताः; कृतोदकार्याः कृतजप्यमङ्गलाः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
दृषद्वतीं विपाशां च विपापां स्थूलवालुकाम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पय़ित्वा च देवताः |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
दृष्टं च राजा वाहुभ्यां तद्राष्ट्रं सुखमेधते ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
दृष्टं दुर्योधनेदं ते यथा पार्थेन धीमता |
३७ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टं प्रमाणं विपुलं शरीरस्यास्य ते विभो |
१२ क