शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ||
२६ ग
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
सुव्रतापि हि कल्याणी सर्वलोकपरिश्रुता |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सुशर्मणा गृहीतं तु गोधनं तरसा वहु ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मणो रणे योधान्प्राहिणोद्यमसादनम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मन्गच्छ शीघ्रं त्वं वलौघैः परिवारितः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा च नरव्याघ्रस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा च विराटश्च पाण्डवेय़ा महावलाः ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सुशर्मा चेकितानश्च सुरथोऽमित्रकर्षणः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा तु ततः पार्थं विद्ध्वा नवभिराशुगैः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा तु ततो राजन्वाणेनानतपर्वणा |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा तु महाराज चेकितानं महारथम् |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सुशर्मा तु यथोद्दिष्टं देशं यातु महारथः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं विशां पते |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वय़ात् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मा शकुनिश्चैव युय़ुधाते किरीटिना |
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं कृपं चैव त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं च सङ्क्रुद्धो जत्रुदेशे समार्दय़त् ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं नरव्याघ्रं चेकितानो महारथः |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं रणे हत्वा पुत्रानस्य महारथान् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं शरव्रातैर्मोहय़ित्वा न्यवर्तत ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं समासाद्य विभेद हृदय़ं रणे ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं समुद्दिश्य चिक्षेपाशु हसन्निव ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणमथो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मापि ततो वाणैः पार्थं विव्याध संय़ुगे |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
सुशर्मापि रणे पार्थं विद्ध्वा वहुभिराय़सैः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
सुशर्मापि सुसङ्क्रुद्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सुशिक्षितः कृतवैरस्तरस्वी; दहेत्क्रुद्धस्तरसा धार्तराष्ट्रान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
सुशिक्षितैर्भाष्यकथाविशारदैः; परेषु कृत्यानुपधारय़स्व ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सुशिरोग्रीववाह्वंसं व्यूढोरस्कं निरूदरम् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सुशिष्यो मम कौरव्यो गदाय़ुद्ध इति प्रभो ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सुशीततोय़ां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ||
१०७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
सुशीलवृत्तो व्यपनीतकल्मषो; न चेह नामुत्र च कर्तुमीहते |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सुशीलाः शुक्लजातीय़ाः क्षान्ता दान्ताः सुतेजसः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
सुशृङ्गं शतशृङ्गं च शर्यातिवनमेव च |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
सुशृतं पाय़से व्रूय़ाद्यवाग्वां कृसरे तथा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सुश्लिष्टानि तथा राजन्प्राणिनामिह सम्भवः ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
सुषाव च वहून्सोमान्सोमसंस्थास्ततान च ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
सुषुपुस्तत्र राजेन्द्र युक्ता वाहेषु सर्वशः ||
३९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
सुषुवे चापि समय़े पुत्रं सा सरितां वरा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सुषेणं च ततो हत्वा प्रेषय़ामास मृत्यवे ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणं दीर्घनेत्रं च त्रिभिस्त्रीनवधीद्वली ||
९४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सुषेणं पञ्चभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणं वहुभिर्वाणैर्वारय़ामास संय़ुगे ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सुषेणं सत्यसेनं च त्रिभिस्त्रिभिरताडय़त् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणः सत्यसेनश्च त्यक्त्वा प्राणानय़ुध्यताम् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सुषेणः सत्यसेनश्च मुञ्चन्तौ निशिताञ्शरान् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
सुषेणमेकेन शरेण विद्ध्वा; शल्यं चतुर्भिस्त्रिभिरेव कर्णम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
सुषेणमैन्दद्विविदैः कुमुदेनाङ्गदेन च |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
सुषेणशीर्षं पतितं पृथिव्यां; विलोक्य कर्णोऽथ तदार्तरूपः |
११ क