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शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सुषेणस्तु ततः क्रुद्धः पाण्डवं विशिखैस्त्रिभिः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सुषेणस्तु ततः क्रुद्धः पाण्डवस्य महद्धनुः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणस्तु धनुर्गृह्य भारसाधनमुत्तमम् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणाय़ासृजद्भीमस्तमप्यस्याच्छिनद्वृषः ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
सुषेणो भीमसेनस्य छित्त्वा भल्लेन कार्मुकम् |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
सुषेणोऽरिष्टसेनश्च धृतसेनश्च वीर्यवान् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
सुष्वाप जामदग्न्यो वै विस्रम्भोत्पन्नसौहृदः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
सुष्वाप भगवान्विष्णुरप्शय़्यामेक एव ह |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सुष्वाप रजनीं तां तु विशल्य इव कुञ्जरः ||
३९ ग
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुष्वाप विगतज्ञाना मृतकल्पा नराधिप ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
सुसंनद्धाः कवचिनः सशिरस्त्राणभूषणाः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सुसंनिकृष्टाः सङ्ग्रामे भूय़िष्ठं त्यक्तजीविताः ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सुसंनिकृष्टावनिलोद्धतौ यथा; तथा रथौ तौ ध्वजिनौ समीय़तुः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सुसंनिकृष्टैः सङ्ग्रामे हतभूय़िष्ठसैनिकैः ||
५४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
सुसंमृष्टक्षय़ा चैव गोशकृत्कृतलेपना ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
सुसंमृष्टगृहाश्चासञ्जितस्त्रीका हुताग्नय़ः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुसंमृष्टजनाकीर्णं वणिग्भिरुपशोभितम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
सुसंमृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमोद्गमे गृहे ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सुसंरव्धः कर्णशरक्षताङ्गो; रणे पार्थः सोमकान्प्रत्यगृह्णात् |
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
सुसंरव्धेषु पार्थेषु पराक्रान्तेषु सञ्जय़ |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
सुसंरव्धोऽपि रामाणां न व्रूय़ादप्रिय़ं वुधः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सुसंवीताभवद्देवी देववत्कृष्णमीक्षती ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
सुसंवृतं मन्त्रगृहं स्थलं चारुह्य मन्त्रय़ेः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
सुसंवृतो मन्त्रधनैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
सुसंस्कृतानि प्रय़ताः शुचीनि गुणवन्ति च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
सुसंहताः प्रतनवो व्यूढोरस्काः सुसंस्थिताः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
सुसंहितः केशवेन गच्छ तात युधिष्ठिरम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
सुसंय़ता मातलिना प्रामथ्नन्त दितेः सुतान् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
सुसंय़ताश्चापि जटा विभक्ता; द्वैधीकृता भान्ति समा ललाटे |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
सुसङ्गुप्ताः सुरभय़ोऽनवद्याः; कच्चिद्गृहानावसथाप्रमत्ताः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सुसङ्गृहीतस्त्वेवैष त्वय़ा धर्मपुरोगमः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
सुसङ्गृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सुसङ्ग्राहाः सुसन्तोषा हेमभाण्डपरिच्छदाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
सुसन्तुष्टांश्च कौन्तेय़ महोत्साहांश्च कर्मसु ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
सुसन्तोषः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
सुसन्दीप्तं महत्कृत्वा तमाह शरणागतम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
सुसमाहितचेतास्तु ततोऽचिन्तय़त प्रभुः ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय १३८
लोमश उवाच
सुसमिद्धं ततः पश्चात्प्रविवेश हुताशनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
सुसमिद्धे महत्यग्नौ शरीरमुपतापय़न् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
सुसमिद्धे महावाहुः पावके पावकप्रभः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
सुसमिद्धो यथा दीप्तः पावकस्तद्विधः स्मृतः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुसमीकृतभूभागे स्वभावविहिते शुभे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
सुसम्पूर्णः स्वय़ा योन्या लव्धलाभोऽसि काश्यप ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
सुसम्वद्धौ तु तौ दम्यौ दमनाय़ाभिनिःसृतौ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
सुसुखं वत जीवामि यस्य मे नास्ति किञ्चन |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
सुसुखः पवनः स्वर्गे गन्धश्च सुरभिस्तथा |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
सुसुखा सा सभा राजन्न शीता न च घर्मदा |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
सुसूक्ष्मं च व्यलीकं ते सपुत्रस्य न विद्यते ||
२५ ख