chevron_left  सुसूक्ष्ममपिarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २७५
अग्निरु उवाच
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दं प्रय़ोक्ष्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुसूक्ष्मसत्त्वसंय़ुक्तं संय़ुक्तं त्रिभिरक्षरैः |
७५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सुसूक्ष्मा किल कालस्य गतिर्द्विजवरोत्तम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना वुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
सुसूक्ष्मोऽपीह देहे वै शल्यो जनय़ते रुजम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
भीमसेन उवाच
सुस्कन्धोऽय़ं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
सुस्थराश्च सुकुट्टाश्च कुणिन्दाः कुन्तिभिः सह ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुस्थितः शास्ति दण्डेन व्यसनी परिभूय़ते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
सुस्थेय़ं क्षुरधारासु निशितासु महीपते |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
सुस्राव चास्य रुधिरं विद्धस्य परमेषुभिः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
सुस्राव रुधिरं गात्रैर्गैरिकं पर्वतो यथा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
सुस्राव रुधिरं भूरि गैरिकाम्भ इवाचलः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
सुस्राव रुधिरं भूरि पर्वतः सलिलं यथा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रं प्रध्याय़न्तो विशां पते ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
सुस्वरो मधुपर्कश्च हेमवर्णस्तथैव च |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिः स्वनः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कथञ्चन |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वासुदेव उवाच
सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृज्जनवृतास्तत्र विहृत्य मधुसूदन |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
सुहृज्जनश्च प्राय़ो मे नगरे नागसाह्वय़े ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृत्कार्यं तु सुमहत्कृतं ते स्याज्जनार्दन ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
सुहृत्सम्वन्धिवर्गाणां ततो दद्याज्जलाञ्जलिम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् |
१०८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदः फलसत्कारैरभ्यर्चय़ यथार्हतः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदश्च ततः सर्वे दृष्ट्वा राजानमातुरम् ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदश्च प्रहृष्येरंस्तथा कुरु परन्तप ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
सुहृदश्चानुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदश्चापि धर्मात्मा धनेन समतर्पय़त् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
सुहृदश्चैव कल्याणानाशु त्यजति किल्विषी ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदश्चैव तं सर्वे पृथक्च सह चाव्रुवन् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
सुहृदस्तादृशान्हित्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄनपि |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदस्त्वद्धिते युक्तान्भीष्मद्रोणमुखान्परैः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदस्त्वव्रुवंस्तत्र अति सर्वानय़ं क्रतुः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
सुहृदा मज्जमानेषु सुहृत्सु व्यसनार्णवे ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सुहृदा यदिदं वाच्यं भवता श्रावितो ह्यहम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां कारय़ामास सर्वेषामौर्ध्वदैहिकम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
जनमेजय़ उवाच
सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
सुहृदां च जपेत्कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
सुहृदां च जपेत्कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य वा ||
६३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां चापि धर्मज्ञाः प्रचक्रुः सलिलक्रिय़ाः ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां चास्मदादीनां द्रौपद्याश्च परन्तप |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां चैव तच्छ्रुत्वा समन्युरिदमव्रवीत् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां प्रिय़माख्यातुं घोषय़न्तु च ते जय़म् ||
४७ ग
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः |
५८ क