शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनः कृती वीर एकाय़नगतस्तथा ||
११ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सुय़ोधनः सूक्तमपि न करिष्यति ते वचः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनभय़ाद्या नोऽत्राय़तामित्रकर्शन |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनमतिक्रान्तमेनं पश्य धनञ्जय़ |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सुय़ोधनमते तिष्ठन्राजास्मासु जनार्दन |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधनमभित्यज्य त्रय़ एते व्यवस्थिताः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनमसङ्गृह्य न शक्या भूः ससागरा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधनमिदं वाक्यमव्रवीद्राजसंसदि ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनमिमं पापं हन्तास्मि गदय़ा युधि |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं ह्रदं गतम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधनवलं त्वद्य योधय़िष्ये समन्ततः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौवलः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
सुय़ोधनश्चापि न शान्तिमिच्छ; न्भूय़ः स मन्योर्वशमन्वगच्छत् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनस्तानवश्यं वृणुय़ाद्रथसत्तमान् |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
सुय़ोधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौवलस्य च ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधनस्य गदय़ा भङ्क्तास्म्यूरू महाहवे |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
सुय़ोधनस्य मोक्षाय़ प्रय़तध्वमतन्द्रिताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनाय़ानुचरैर्वृताय़; ततो महीमाहर धर्मराज |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधने कौरवेन्द्रे खाण्डवे पावको यथा ||
१६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
सुय़ोधनो नार्हतीति क्षमामेवं न विन्दति |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनो मन्युमय़ो महाद्रुमः; स्कन्धः कर्णः शकुनिस्तस्य शाखाः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनो यय़ावग्रे श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सूकरः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि श्वाविधः |
६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रिय़ते नृप ||
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्तं सुशर्मणा वाक्यं प्राप्तकालं हितं च नः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
सूक्ष्मं विशेषणं तेषामवेक्षेच्छास्त्रचक्षुषा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्ष्मं स्थूलं मृदु यच्चाप्यसूक्ष्मं; सुखं दुःखं सुखदुःखान्तरं च |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत |
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
सूक्ष्मज्ञानरताः पूर्वं ज्ञात्वा मुच्यन्ति वन्धनैः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेय़ं दूरस्थं चान्तिके च तत् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
सूक्ष्मत्वाद्गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
सूक्ष्मत्वान्न स विज्ञातुं शक्यते वहुनिह्नवः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो ज्ञात्वा श्येनं ततोऽव्रवीत् ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
सूक्ष्मधर्मार्थनिय़तं सतां चरितमुत्तमम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
सूक्ष्ममष्टगुणं प्राहुर्नेतरं नृपसत्तम ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
सूक्ष्मरक्ताम्वरधरास्तप्तकाञ्चनभूषणाः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
सूक्ष्मरूपधरा देवी वभूवोपश्रुतिश्च सा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्ष्मस्तु मतिमान्राजन्कीर्तिमान्यः प्रकीर्तितः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेय़ा ह्यकृतात्मभिः ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
युधिष्ठिर उवाच
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य वहुशाखा ह्यनन्तिका ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ||
९३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्ष्मान्प्रावारानजिनानि चोदिता; न्दृष्ट्वारण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सूक्ष्माम्वरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
ऋषय़ ऊचुः
सूक्ष्मार्थन्याय़युक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण्यु उवाच
सूक्ष्मेऽवकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः |
४ क