भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
जानन्तोऽपि रणे शौर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य; न्ययोजय़न्दस्युवधाय़ कृष्णम् |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
जानन्त्यप्यतुलं वीर्यमाशीर्वादसमन्वितम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
जानन्त्येते कुरवः सर्व एव; ये चाप्यन्ये भूमिपालाः समेताः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
जानन्त्येते यथैवाहं वीर्यज्ञस्तस्य धीमतः ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
जानन्धर्मार्थतत्त्वज्ञः किमर्जुन विगर्हसे ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
जानन्न विव्रुवन्प्रश्नं कामात्क्रोधात्तथा भय़ात् |
६७ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
जानन्नपि क्षय़करं नातिक्रमितुमुत्सहे ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान्न निय़च्छति |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
जानन्नपि प्रभावं ते योत्स्येऽद्याहं त्वय़ा सह ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्नपि महाराज कस्मादेवं प्रभाषसे |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्नपि महावुद्धिः पुनर्द्यूतमवर्तय़त् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
जानन्निमं सर्वलोकस्य धर्मं; व्राह्मणानां क्षत्रिय़ाणां विशां च |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
जानन्नेवाह्वय़े युद्धे शल्य नाग्निं पतङ्गवत् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
जानन्पितुः स निधनं सिंहलाङ्गूलकेतनः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
जानन्मां किं महावाहो संमोहय़ितुमिच्छसि ||
१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
इन्द्र उवाच
जानन्यो गामपहरेद्विक्रीय़ाद्वार्थकारणात् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
जानन्वक्रां न सेवेत प्रतिवाधेत चागताम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
जानन्विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम् ||
१३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्विनाशं वृष्णीनां नैच्छद्वारय़ितुं हरिः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
जानन्वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
जानन्वै मोहय़सि मां नावि नौरिव संय़ता |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
जानन्सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
जानमानस्तु भगवाञ्जितः शुश्रूषणेन च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
जानाति देवप्रवरं भूय़श्चातोऽधिकं नृप |
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
चित्रसेन उवाच
जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
जानाति मात्रां च तथा क्षमां च; तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा ||
८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
जानाति विश्वासय़ितुं मनुष्या; न्विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम् |
८६ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
जानाति हि मतं तेषामतस्त्रासय़तीव नः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
जानाति हि सदा भीष्मः पाण्डवानां यशस्विनाम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
जानाति ह्येष दुर्वुद्धिरस्मानिह चिरोषितान् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
जानातु कृष्णस्तव भावमेतं; सर्वात्मना मां भजतीति सत्ये ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
जानातु मां रणे कृष्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
व्यास उवाच
जानात्येष हृषीकेशं पुराणं यच्च वै नवम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
जानानोऽप्यक्षय़ान्पाण्ड्योऽशातय़त्पुरुषर्षभः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
जय़द्रथ उवाच
जानामि कृष्णे विदितं ममैत; द्यथाविधास्ते नरदेवपुत्राः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
जानामि क्षुधितं हि त्वामाहारसमय़श्च ते |
१६३ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
जानामि च त्वां सुरथस्य पुत्रं; यं कोटिकाश्येति विदुर्मनुष्याः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
जानामि च यथा राज्ञि सभाय़ां मम संनिधौ |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
जानामि चाहं विप्रर्षे न मिथ्या त्वं करिष्यसि ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
जानामि चैव सत्यं तन्मदर्थं यदभाषथाः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
युधिष्ठिर उवाच
जानामि तत्त्वं धर्मज्ञ प्राणत्यागं सुदुष्करम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
कण्व उवाच
जानामि तु तथात्मानं दित्सात्मकमलं यथा ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं; वृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
जानामि ते मतं राजन्गूढं वाह्येन कर्मणा ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
जानामि ते वासुदेवं सहाय़ं; जानामि ते गाण्डिवं तालमात्रम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
जानामि ते स्थितिं सत्ये परां सत्यपराक्रम |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
जानामि त्वा परिश्रान्तं तात विश्रामकाङ्क्षिणम् |
८८ क