अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
विभर्ति देवस्तनुभिरष्टाभिश्च ददाति च ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
विभर्ति देवीं शिरसा महीमिमां; समुद्रनेमिं परिगृह्य सर्वतः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
विभर्ति यादृशं रूपं कालाग्निसदृशं शुभम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
विभर्ति रूपं सोऽर्कस्य तमोनाशात्सुनिर्मलम् ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
विभर्तुं तेजसोऽर्धं ते न शक्ष्यामो महेश्वर |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
विभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
विभर्त्यविमना नित्यमानृशंस्याद्युधिष्ठिरः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
विभर्षि हि वहून्विप्रान्वेदवेदाङ्गपारगान् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
विभवश्चास्ति मे विप्र वासवावरजो द्विज |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
विभवश्चास्य सुमहानासीद्धनपतेरिव |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
विभवे न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वर्जितं सताम् |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
विभागं कीर्तय़त्येव सुप्रतीकोऽथ नित्यशः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
विभागं वहवो मोहात्कर्तुमिच्छन्ति नित्यदा |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
विभाण्डकस्य व्रह्मर्षेस्तपसा भावितात्मनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
विभाण्डकस्याव्रजतः स राजा; पशून्प्रभूतान्पशुपांश्च वीरान् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विभाति देहः कर्णस्य स्वरश्मिभिरिवांशुमान् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
विभाति भगवान्स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विभाति सम्पूर्णमरीचिभास्वता; शिरोगतेनोदय़पर्वतो यथा ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
विभात्यभ्यधिकं तात सप्तम्यामिव चन्द्रमाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां; गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
विभावरीमुखे व्योम खद्योतैरिव चित्रितम् ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
विभावर्यां सुतुमुलं शक्रप्रह्रादय़ोरिव ||
९० ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
विभावसुः प्रज्वलितो वामं विपरिवर्तते |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा; हिरण्यरेता विश्वभुक्कृष्णवर्त्मा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं; सुदर्शनं भीममजय़्यमुत्तमम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
विभाव्यं तस्य भूय़श्च कर्म पापं दुरात्मनः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
विभाष्यघातिनः केचित्तथा चक्षुर्हणोऽपरे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
विभित्सता रथानीकं सौभद्रेणामितौजसा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
विभित्सतो रथानीकं भारद्वाजेन रक्षितम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
विभित्सन्तो महासेतुं वार्योघाः प्रवला इव ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
विभित्सवस्ततो व्यूहं निर्ययुर्युद्धकाङ्क्षिणः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विभिदुर्दन्तमुसलैः समासाद्य परस्परम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
विभिदुर्धार्तराष्ट्राणां तद्रथानीकमाहवे ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
विभिदुश्च विषाणाग्रैः समाक्षिप्य च चिक्षिपुः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
विभिदुस्तुमुले युद्धे प्रार्थय़न्तो महद्यशः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
विभिदुस्ते मणिस्तम्भान्कर्णाट्टशिखराणि च |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
विभिदुस्ते महाराज शल्यं युद्धविशारदम् ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विभिन्नकलशाकीर्णं श्वचर्माच्छादनाय़ुतम् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
विभिन्नगात्रः क्षतजोक्षिताङ्गः; कर्णो वभौ रुद्र इवाततेषुः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
विभिन्नगात्राः पतितोत्तमाङ्गा; गतासवश्छिन्नतनुत्रकाय़ाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
विभीतकश्चाप्रशस्तः संवृत्तः कलिसंश्रय़ात् ||
३६ ग
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद्गृहान्प्रति ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणः प्रहस्तं च प्रहस्तश्च विभीषणम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणः शीर्णपर्णमेकमभ्यवहारय़त् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणमते चैव सोऽत्यक्रामन्महार्णवम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणर्क्षाधिपती पुरस्कृत्याथ लक्ष्मणः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां धर्ममनुस्मरन् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणस्तु रूपेण सर्वेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
विभीषणानि यानीक्ष्य पलाय़ेथास्त्वमेव मे ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
विभीषणाय़ धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिन्दमः ||
५० ग