chevron_left  सूदैःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
सूदैः पौरोगवैश्चैव सर्वैश्च परिचारकैः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सूदय़िष्यन्ति च पतीन्स्त्रिय़ः पुत्रानपाश्रिताः ||
७८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सूदय़िष्यामि विक्रम्य कक्षं दीप्त इवानलः |
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सूदय़िष्यामि विक्रम्य मघवानिव दानवान् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
सूदय़ेम महावाहो देशकालो ह्ययं नृप ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
सूपतीर्थां शुचिजलां शर्करापङ्कवर्जिताम् ||
७३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सूपतीर्थाभवद्गङ्गा भूय़ो विप्रससार च ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
सूपतीर्थामकलुषां सर्वर्तुसलिलां शुभाम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सूपभूय़िष्ठमश्नीध्वं नाद्य मांसं यथा पुरा ||
१२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सूपस्करं सोत्तरवन्धुरेषं; यत्तं यदूनामृषभेण सङ्ख्ये |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैय़ाघ्रपरिवारणम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
सूपस्करमनाधृष्यं वैय़ाघ्रपरिवारणम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
सूपस्करेण शुभ्रेण वैय़ाघ्रेण वरूथिना |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सूपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सूपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकवन्धुरैः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय २
भीम उवाच
सूपानस्य करिष्यामि कुशलोऽस्मि महानसे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सूर्मीं ज्वलन्तीमाश्लिष्य मृत्युना स विशुध्यति ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
सूर्य एको विचरति चन्द्रमा जाय़ते पुनः |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
व्राह्मण उवाच
सूर्यं चक्षुर्दिशः श्रोत्रे प्राणोऽस्य दिवमेव च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
सूर्यं सदोपतिष्ठेत न स्वप्याद्भास्करोदय़े |
५ क
विराट पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां व्राह्मणो वरः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यचन्द्रप्रतीकाशो रथे दिव्ये हिरण्मय़ः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा निय़तमानसः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
रेणुको उवाच
सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छाय़ामुपाश्रिता ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसाय़कैः ||
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
सूर्यदत्तश्च शङ्खश्च मदिराश्वश्च नामतः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सूर्यदत्तादिभिर्वीरैर्मदिराश्वपुरोगमैः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
सूर्यध्वजो रोचमानो नीलश्चित्राय़ुधस्तथा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
सूर्यपावकय़ोस्तुल्यास्तेजसा समितिञ्जय़ाः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
सूर्यपुत्रशरैस्त्रस्तानपश्याम विशां पते ||
११२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यपुत्रोऽग्रजः श्रेष्ठो राधेय़ इति विश्रुतः |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
सूर्यभासं च पञ्चैतान्हत्वा विव्याध सौवलम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
सूर्यमग्निः प्रविष्टः स्याद्यथा चाग्निं दिवाकरः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
सूर्यमण्डलसङ्काशं तपतस्तव वाहिनीम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
सूर्यमाराधय़ामास नृपः संवरणः सदा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सूर्यमालासमाभासमारोहेत्पाण्डुरं गृहम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१
सूत उवाच
सूर्यरश्मिपरीताश्च मूर्च्छिताः पन्नगाभवन् |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
सूर्यरश्मिप्रतीकाशैः कर्मारपरिमार्जितैः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद्भुवि |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
सूर्यरूपाणि चाभान्ति दीप्ताग्निसदृशानि च |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सूर्यवर्णैश्च निस्त्रिंशैः पात्यमानानि सर्वशः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यवैश्वानरनिभान्सोमकल्पान्महारथान् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः |
७२ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव भासतस्तपसा दिवि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
सूर्यश्चक्षुरसुर्वाय़ुरद्भ्यस्तु खलु शोणितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
सूर्यस्ताराधिपो वाय़ुरग्निर्वरुण एव च |
८ ख