कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सृगाल इव मूढत्वान्नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
सृगालगृध्रकाकोलाः सदस्यास्तत्र सत्रिणः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सृगालरूपः सर्वार्थो मुण्डः कुण्डी कमण्डलुः ||
४४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सृगालवडकाकोलकङ्ककाकनिषेवितम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
सृगालश्च महाराज स्त्रीराज्याधिपतिश्च यः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
सृगालस्य च संवादं वानरस्य च भारत ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
सृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत्तदा ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सृगालोऽपि वने कर्ण शशैः परिवृतो वसन् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
सृज प्रजास्त्वं विविधा व्रह्मन्सजडपण्डिताः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सृजतां शरवर्षाणि तोमरांश्च सहस्रशः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सृजतां शरवर्षाणि प्रसक्तममितौजसाम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सृजतामशिवा वाचः खड्गकार्मुकधारिणाम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
सृजते च पुनः सर्वं नेह विद्यति शाश्वतम् ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सृजते च पुनर्लोकान्नेह विद्यति शाश्वतम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
सृजते च महद्भूतं तस्माद्व्यक्तात्मकं मनः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
सृजते तु गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञस्त्वनुतिष्ठति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
सृजते सर्वतोऽङ्गानि तथा वेदा युगे युगे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सृजते हि गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सृजत्यनन्तकर्माणं महान्तं भूतमग्रजम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
सृजत्यसौ शरवर्षाणि वीरो; महाहवे मेघ इवाम्वुधाराः ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
सृजत्यहङ्कारमृषिर्भूतं दिव्यात्मकं तथा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
सृजत्येष महावाहो भूतग्रामं चराचरम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
सृजत्योषधिमेवाग्रे जीवनं सर्वदेहिनाम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२
सूत उवाच
सृजद्भिरतुलं तोय़मजस्रं सुमहारवैः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
सृजन्तं राक्षसीं माय़ां महारावविराविणम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
सृजन्तं शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्वुदम् ||
१०४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सृजन्तं साय़कान्क्रुद्धं कर्णमाहवशोभिनम् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्वनम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सृजन्तो विविधान्वाणाञ्शतघ्नीश्च सकिङ्किणीः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः ||
१७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सृजन्वाणमय़ं वर्षं प्राय़ाच्छल्यरथं प्रति ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
सृजस्व शवरान्घोरानिति स्वां गामुवाच ह ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
सृजेतां स्पर्धिनावेतौ दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
सृज्यतां प्रार्थनीय़ेह प्रमदेति महातपाः ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
सृज्यन्ते चापरे व्रह्मन्स चैकः पुरुषो विराट् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगे युगे ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सृञ्जय़ं पुत्रशोकार्तं यथाय़ं प्राह नारदः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
सृञ्जय़ं श्वैत्यमभ्येत्य राजानमिदमूचतुः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
सृञ्जय़श्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
सृञ्जय़श्च स राजर्षिर्जामदग्न्यश्च भारत ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
सृञ्जय़स्य वचः श्रुत्वा तव चैव शुचिस्मिते |
४ क