शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
सत्त्ववन्तो महाभागाः पश्यन्ति प्रभवाप्ययौ ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
सत्त्ववांस्तु तथा सत्त्वं प्रतिरूपं प्रपश्यति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपराय़णः |
१०६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
सत्त्वशीलगुणोपेता गुणकेशीति विश्रुता ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सत्त्वसंशीलनान्निद्रामप्रमादाद्भय़ं तथा |
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
सत्त्वसंसेवनाद्धीरो निद्रामुच्छेतुमर्हति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
सत्त्वसंसेवनाद्धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
सत्त्वस्थं च मनो नित्यं तव भीष्म भविष्यति |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
सत्त्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान्सृजत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
सत्त्वस्थः सर्वमुत्सृज्य दीक्षितो निय़तः शुचिः |
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
सत्त्वस्थः सात्त्विकान्भावाञ्शुद्धान्पश्यति संश्रितः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
सत्त्वस्थाः शौर्यसम्पन्ना अन्योन्यप्रिय़कारिणः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वस्थान्पाण्डवान्पश्य न ते प्राय़मुपाविशन् |
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सत्त्वस्य च गुणान्कृत्स्नान्रजसश्च गुणान्पुनः |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
सत्त्वस्य तु रजो दृष्टं रजसश्च तमस्तथा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निवोध तान् ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
सत्त्वात्परतरं नान्यत्प्रशंसन्तीह तद्विदः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वात्सञ्जाय़ते ज्ञानं रजसो लोभ एव च |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वान्न च्युतपूर्वोऽहं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
सत्त्वालङ्कारदीप्तं च गुणसङ्घातमण्डलम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
सत्त्वाहारविशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
सत्त्वे चित्तं समावेश्य ततः कालञ्जरो भवेत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुवलवानपि |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुवलवानपि |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
सत्त्वेन रजसा चैव तमसा चैव मोहिताः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सत्त्वेनानुप्रवेशो हि योऽय़ं त्वय़ि कृतो मय़ा |
१६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
सत्त्वेषु लिङ्गमावेश्य नलिङ्गमपि तत्स्वय़म् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति दुर्वलैर्वलवत्तराः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति वहुधा द्विजसत्तम |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सत्त्वैराक्रान्तसर्वाङ्गां नष्टां सागरमेखलाम् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
सत्त्वैश्च वहुसाहस्रैर्नानारूपैः समावृतम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विषमे पथि ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
सत्पुत्रेण त्वय़ा पुत्र नित्यकालं सुपूजितौ ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं किंलक्षणं राजन्कथं वा तदवाप्यते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
सत्यं किलैतत्सा प्राह दैत्यानामसि गाय़नः ||
३० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं क्षमां दमं प्रज्ञां प्रशंसन्ति पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
सत्यं च धर्मवचनं यथा नास्त्यधनस्तथा ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
सत्यं च वदतो राजन्समं वा स्यान्न वा समम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
सत्यं च व्रुवतो नित्यं समं वा स्यान्न वा समम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
सत्यं च समता चैव दमश्चैव न संशय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं चानृततः श्रेय़ो नृशंसाच्चानृशंसता |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
सत्यं चिकीर्षता पश्य हतमेनं जय़द्रथम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
सत्यं चिकीर्षमाणस्तु धारय़ामास हृच्छय़म् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सत्यं चेदं व्रह्मणा पूर्वमुक्तं; दण्डः प्रजा रक्षति साधु नीतः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं चैवानृतं चोभे लोकानावृत्य तिष्ठतः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मनः ||
३७ ख