द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
सैन्धवस्य रणे रक्षां विधिवत्कर्तुमर्हथ |
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य वधप्रेप्सुः प्रय़ातः शत्रुपूगहा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य वधार्थं हि पराक्रान्तं पराक्रमी ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य वधे युक्तमनुय़ास्यामि पाण्डवम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य वधेनैव भृशं दुःखसमन्वितः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवस्य विधाय़ैवं रक्षां युय़ुधिरे तदा ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्धवा मुमुचुस्तूर्णं गतसत्त्वे महारथे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्धवाच्च परिक्लेशं कथं विस्मृतवानसि |
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्धवापसदः पापो दुर्मतिः कुलपांसनः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
सैन्धवारण्यमासाद्य कुल्यानां कुरु दर्शनम् |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवासक्तदृष्टित्वान्नैनं पश्यामि माधव |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवाय़ च वार्ष्णेय़ं युय़ुधानमुपादिशत् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवे निहते राजन्नय़ुध्यन्त महारथाः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवे निहते राजन्पुत्रस्तव सुय़ोधनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवे रक्ष्यमाणे तु सूर्यस्यास्तमय़ं प्रति |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
सैन्धवे हि महाद्यूतं समासक्तं परैः सह ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवेन निरुद्धेषु जय़गृद्धिषु पाण्डुषु |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवेन परिक्लिष्टा परिभूय़ पितॄन्मम ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्धवैरभवद्युद्धं ततस्तस्य किरीटिनः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवो नवभिश्चापि शकुनिश्चापि पञ्चभिः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
सैन्धवो निहतो राजन्दैवमत्र परं स्मृतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
सैन्धवो नेच्छते द्यूतं भीष्मो न द्यूतमिच्छति ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
सैन्धवो यादवश्रेष्ठ तच्च नातिप्रिय़ं मम ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सैन्यं तव महाराज युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सैन्यं रजःसमुद्धूतमेतत्सम्परिवर्तते ||
७२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
सैन्यं सैन्येन व्यूढेन एक एकेन वा पुनः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यक्षय़करं चैव प्राणानां संशय़ाय़ च |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सैन्यमालोकय़ामास नापश्यत्तत्र चाग्रजम् ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सैन्यरेणुं समुद्धूतं पश्यस्वैनं समन्ततः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यसुग्रीवय़ुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यसुग्रीवय़ुक्तेन प्रत्यदृश्यत दारुकः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यसुग्रीवय़ुक्तेन रथेन रथिनां वरः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यसुग्रीवय़ुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
सैन्यसुग्रीवय़ुक्तेन रथेनानादय़न्दिशः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सैन्यस्थानेषु सर्वेषु व्याघोषितमरिन्दम ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सैन्यस्य तव तं शव्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सैन्यस्यैकोऽवशिष्टोऽय़ं गदाय़ुद्धे च वीर्यवान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सैन्याननेकांस्तरसा विमृद्न; न्यदा क्षेप्ता धार्तराष्ट्रस्य सैन्यम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानां च ततो राजन्नाचार्ये निहते युधि ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
सैन्यानां तु तवैतेषां पुत्रपौत्रवलान्वितम् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानि द्रावय़न्तं तं द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानि द्रावय़न्तं तु द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानि रौद्राणि भय़ानकानि; व्यूढानि सम्यग्वहुलध्वजानि |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सैन्यानि समसज्जन्त प्रय़ुद्धानि समन्ततः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सैन्यान्यघटय़द्यानि द्रोणस्तु रथिनां वरः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सैन्यारण्यं तव तथा कृष्णानिलसमीरितः |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
सैन्यार्णवं समुत्तीर्णौ दिष्ट्या पश्यामि चानघौ |
३१ क