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वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
सोमं तु रजसा ध्वस्तं विक्रीय़ाद्वुद्धिपूर्वकम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
सोमः कथं नु पातव्य इहस्थेन मय़ा भवेत् ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
सोमः पञ्चशतं राजा तथैव वरुणः शतम् |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
सोमः प्रजापतिः पूर्वं कुरूणां वंशवर्धनः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सोमकन्यानिवासेषु सोऽध्यावसति नित्यदा |
६९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
सोमका मत्स्यशेषाश्च सर्वे विनिहता मय़ा ||
१५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
सोमकांश्च जितान्दृष्ट्वा निरुत्साहान्महारथान् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
सोमकांश्च महेष्वासान्सत्यवाग्भव भारत ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
सोमकांश्च रणे भीष्मो जघ्ने पार्थपदानुगान् |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सोमकाश्च सपञ्चालाः प्राहृष्यन्त जनेश्वर ||
१०७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
सोमक्षय़श्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी कुरूद्वह |
१६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तं तु सङ्क्रुद्धो रणे विव्याध सात्यकिः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तं तु सम्प्रेक्ष्य विधुन्वानं महद्धनुः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तं महेष्वासं समन्तात्पर्यरक्षत ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तः पुनः कुर्द्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सोमदत्तप्रभृतय़ः का नु तेषां गतिः प्रभो ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तश्च भूरिश्च तथा द्रौणिर्विविंशतिः ||
५४ ग
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
सोमदत्तसुतं पश्य युय़ुधानेन पातितम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तस्तु तं षष्ट्या विव्याधोरसि माधवम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तस्त्वसम्भ्रान्तो दृष्ट्वा केतुं निपातितम् |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
सोमदत्तस्य नृपतेर्भूरिश्रवस एव च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तस्य भल्लेन ध्वजमुन्मथ्य चानदत् ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
सोमदत्ताद्विकर्णाच्च शूराच्च कृतवर्मणः |
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तो भृशं क्रुद्धः सात्यकिं वाक्यमव्रवीत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तो महावाहुरसम्भ्रान्तोऽभ्यवर्तत ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तो महावाहुर्निपपात ममार च ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
सोमदत्तो युय़ुत्सुश्च द्रोणपुत्रस्तथैव च |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तोरसि क्रुद्धः सुपत्रं निशितं युधि ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
सोमदत्तोऽथ कौरव्यो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तोऽपि तं वीरं शतेन प्रत्यविध्यत ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तोऽप्यसम्भ्रान्तः शैनेय़मवधीच्छरैः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
सोमपः सूर्यसावित्रो दत्तात्मा पुष्करीय़कः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
सोमपानां च देवानामूष्मपाणां तथैव च |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
सोममुद्ध्वंसय़ामास तं सोमं येऽपिवन्द्विजाः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
सोममेवाभ्यपद्यन्त निवापान्नाभिपीडिताः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशय़ः ||
१६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
सोमविक्रय़िणश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
वसिष्ठ उवाच
सोमश्च भगवान्देवः सर्वे च परमर्षय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
सोमस्तासां महाभागः सर्वासामभवत्पतिः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
सोमस्थानमिदं चेति दर्भांस्ते लिलिहुस्तदा ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जाय़ते |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यज्ञः; प्रजापतेर्यज्ञ आसीत्प्रय़ागे |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
सोमस्य राज्ञः सदने महात्मन; स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
सोमस्य लक्ष्म व्यावृत्तं राहुरर्कमुपेष्यति |
१० क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽय़ं समागमः |
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
सोमस्यात्मा च वहुधा सम्भूतः पृथिवीतले |
१६ क