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भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
नैव शक्या समाधातुं संनिपाते महाचमूः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
नैव शक्याः पराजेतुं सत्त्वं ह्येषां तथागतम् ||
६० ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
नैव शस्त्रं विमुञ्चन्ति नैव क्रन्दन्ति मारिष |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
नैव शान्तिर्न विश्वासः कर्म त्रासय़ते वलात् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
नैव शिष्यान्न च ज्ञातीन्न वालान्स्थविरान्न च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
नैव स प्रतिजानाति व्रह्महत्यां स्वय़ं कृताम् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
नैव सञ्जाय़ते जन्तुर्न च जातु विपद्यते |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
नैव सम्प्राप्नुवन्ति त्वां मुमूर्षुमिव भेषजम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
नैव सूर्यप्रभां खं वा न दिशः प्रदिशः कुतः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
नैव स्त्री न पुमानेतन्नैव चेदं नपुंसकम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
नैव स्थापय़ितुं शक्या शूरैरपि महाचमूः ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
नैव स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्नज्ञाय़न्त परस्परम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्प्राज्ञाय़न्त तमोवृते |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्विज्ञाय़न्ते शरातुराः |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्व्यज्ञाय़न्त तमोवृते ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्समजानन्परस्परम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
नैव स्वय़ंवरकथां न च विप्रसमागमम् ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
नैव हन्यां स्त्रिय़ं जातु न स्त्रीपूर्वं कथञ्चन ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
नैव ह्रस्वा न महती नातिकृष्णा न रोहिणी |
३२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
नैवं कर्तव्यमिति ते तदोचुस्ते नराधिपम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
नैवं पूर्वे नापरे वा करिष्यन्ति कृतानि ते |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
नैवं शम्वरहन्ताभूद्यौवनाश्वो मनुर्न च |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
नैवंरूपा भवन्त्येवं यथा वदसि भामिनि |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
नैवंविधं मय़ा युक्तमालव्धुं क्षत्रय़ोनिना |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ४१
उत्तर उवाच
नैवंविधः शङ्खशव्दः पुरा जातु मय़ा श्रुतः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
नैवंविधाः क्लीवरूपा भवन्ति; कथञ्चनेति प्रतिभाति मे मनः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
नैवंविधाः प्रमुह्यन्ति नराः कस्याञ्चिदापदि ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
नैवङ्गते सौमकिरद्य राजा; सन्तापमर्हत्यसुखाय़ कर्तुम् |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ३
द्रौपद्यु उवाच
नैवमन्याः स्त्रिय़ो यान्ति इति लोकस्य निश्चय़ः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
कर्ण उवाच
नैवमाय़ुष्मता वाच्यं यन्मामात्थ पितामह |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
नैवर्क्षु तन्न यजुःषु नाप्यथर्वसु; न चैव दृश्यत्यमलेषु सामसु |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नैवाकाशे न पशुषु नाय़ोनौ न च पर्वसु |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
नैवागच्छंस्ततो राजन्प्रातिष्ठत स जाजलिः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
नैवाङ्गमिङ्गति किञ्चिन्मे सन्तप्तस्य रणेषुभिः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
नैवातिशीता नात्युष्णा मनसश्च प्रहर्षिणी ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
नैवातिशीतो नात्युष्णः कालो भवति भारत |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽभ्यगच्छत ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
नैवाददानं न च सन्दधानं; जानीमहे कतरेणास्यतीति |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नैवाद्राक्षं न चाश्रौषं तव कश्मलमीदृशम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
नैवान्तं कारणस्येय़ाद्यद्यपि स्यान्मनोजवः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
नैवान्तरिक्षं न दिशो नैव योधाः समन्ततः |
३० क
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किञ्चन ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
नैवान्यं स द्विजश्रेष्ठः कामय़ामास वै वरम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
शृङ्ग्यु उवाच
नैवान्यथेदं भविता पितरेष व्रवीमि ते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
नैवापकारे कस्मिंश्चिदहं त्वय़ि तथा भवान् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
नैवाभिमन्युर्न यमौ तं देशमभिय़ान्ति वै |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
नैवावतस्थुः कुरवः समीक्ष्य; प्रव्राजिता देवलोकाश्च सर्वे ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नैवावतस्थे समरे भृशं भय़ा; द्विमर्दमानं तु परस्परं तदा ||
७ ख