आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
सोऽन्तःपुरं प्रविश्याथ संविवेश नराधिपः ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसञ्ज्ञो विचेतनः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्तरा कृतवर्माणं काम्वोजं च सुदक्षिणम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्तराय़ुधिनं हत्वा राजपुत्रमरिन्दमः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
सोऽन्तरिक्षं महीं चैव सशैलवनकाननाम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽन्तरिक्षचरान्सिद्धान्समपश्यत्समाहितान् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽन्तरिक्षमभिप्लुत्य विधूय़ सहसा गदाम् |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
सोऽन्त्यं व्राह्मं तपस्तेपे संहितां संय़तो जपन् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सोऽन्धोऽपि चङ्क्रम्यमाणः कूपेऽपतत् ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
सोऽन्धौ च मातापितरौ विभर्त्यन्यांश्च संश्रितान् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादत्त गाङ्गेय़ो वलवत्तरम् |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ गाङ्गेय़ो वेगवत्तरम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ पार्षतः परवीरहा |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ पौरवं निशितैः शरैः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ भीष्मं विव्याध पञ्चभिः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ भीष्मस्य प्रमुखे स्थितः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ राजपुत्रो वृहद्वलः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ वेगघ्नं रुक्मभूषणम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ वेगवत्क्रोधमूर्छितः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ शत्रुघ्नं भारसाधनम् |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ शल्यं शरशतैस्त्रिभिः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ समरे भारसाधनम् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ समरे वेगवत्तरम् |
६६ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ सुषेणं समय़ोधय़त् ||
४२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ सूतपुत्रं वृकोदरः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यदादाय़ वलवान्सज्यं कृत्वा च कार्मुकम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यद्धनुः समादाय़ क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
सोऽन्यस्य विषय़े राज्ञो वस्तुमिच्छाम्यहं विभो |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽन्वेषमाणः कौन्तेय़ान्पाञ्चाल्यो जनमेजय़ |
९ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सोऽपकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सोऽपतद्वै ततस्तस्यां चिताय़ां राजधर्मणः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
सोऽपध्यानाद्व्राह्मणस्य पराभूय़ादसंशय़म् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपरान्तेषु तीर्थानि पुण्यान्याय़तनानि च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सोऽपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधेन प्रज्वलन्निव |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
सोऽपश्यत्काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिय़ा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यत्तं कलिङ्गेषु चरन्तमरिसूदनम् |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सोऽपश्यत्पथि नग्नं श्रमणमागच्छन्तं मुहुर्मुहुर्दृश्यमानमदृश्यमानं च |
१३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
सोऽपश्यत्सरितं पूर्णां प्रावृट्काले नवाम्भसा |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यत्सहसाय़ान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यदर्जुनं तत्र युध्यमानं नरर्षभम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
सोऽपश्यदासीनमुपेत्य पुत्रं; ध्याय़न्तमेकं विपरीतचित्तम् |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यद्द्वारमावृत्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपश्यद्भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
सोऽपश्यद्योषामथ पावकप्रभां; यत्र गङ्गा सततं सम्प्रसूता ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
सोऽपश्यद्वनषण्डेषु मेघनीलं वनस्पतिम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽपश्यद्वहुवृत्तान्तां व्राह्मणः समतिक्रमन् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यन्नरशार्दूलं वानरर्षभलक्षणम् |
६ क