आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपश्यमानस्तमृषिं शून्यं दृष्ट्वा तमाश्रमम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
सोऽपसव्यां चमूं तस्य शाल्वस्य भरतर्षभ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
सोऽपहृत्य शिरस्तस्य कुण्डलाभ्यां विभूषितम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जय़तां वरः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशय़ः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
सोऽपि दत्तं हरेत्पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
सोऽपि दत्तं हरेत्पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सोऽपि दृष्ट्वैव तं विप्रमाय़ान्तं भाण्डजीवनः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुय़ात्पुण्यकर्मणाम् ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सोऽपि मृत्युमुपागम्य क्रौञ्चय़ोनौ प्रजाय़ते ||
७७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपि मोहं जगामाशु ततश्चित्राङ्गदासुतः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जाय़ति वानरः ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सोऽपि राजन्मृतो जन्तुः कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सोऽपि राजन्मृतो जन्तुः पूर्वं जाय़ति गर्दभः ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
सोऽपि राजा गिरौ तस्मिन्विजहारामरोपमः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
सोऽपि राजा जरासन्धो यिय़क्षुर्वसुधाधिपैः |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
कृश उवाच
सोऽपि राजा स्वनगरं प्रतिय़ातो गजाह्वय़म् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽपि वालाञ्शिशून्घोरो वाधते वै महाग्रहः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
सोऽपि विंशत्यधिपतिर्वृत्तं जानपदे जने |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
सोऽपि वीरो महावाहुर्यथैव स घटोत्कचः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
सोऽपृच्छल्लम्वमानांस्तान्भवन्त इह किम्पराः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
सोऽपेतवर्मा पुत्रस्ते विरराज भृशं नृप |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽप्यासीन्मोहसम्पन्नो मा मोहवशमन्वगाः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं द्विजसत्तम ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं भाषसे द्विज ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपय़ातो रणं हित्वा पार्थवाणप्रपीडितः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
सोऽपय़ामि शनैर्वीर वलवानेष पापकृत् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
सोऽभवद्गिरिरत्युच्चः शिखरैस्तरुसङ्कटैः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
सोऽभवद्गिरिरित्युच्चः शिखरैस्तरुसङ्कटैः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
सोऽभवद्भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सोऽभिक्रुध्यति भृत्यानां सुहृदश्चाभ्यसूय़ति ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च वुद्धिमान् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
सोऽभिगम्य पितुः पादावगृह्णादरणीसुतः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽभिगम्य प्रिय़ां भार्यामुवाच श्रमपीडितः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिगम्य महात्मानं पितरं सत्यविक्रमम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषविग्रहम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
भीष्म उवाच
सोऽभिगम्य यथाख्यातं नागाय़तनमर्थवित् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिगम्य यथान्याय़ं पाण्डवैः प्रतिपूजितः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सोऽभिगम्याव्रवीद्वाक्यं प्राप्तोऽस्मि भगवन्निति |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
सोऽभिगम्याव्रवीद्विन्ध्यं सदारः समुपस्थितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
सोऽभिगम्याश्रमं भ्रातुः शङ्खस्य लिखितस्तदा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिगर्जन्धनुष्पाणिर्ज्यां विकर्षन्पुनः पुनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्व्राह्मणो जातवेदसम् |
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिनद्वाह्लिकं षष्ट्या कर्णं च दशभिः शरैः ||
१ ख