आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिनिर्याय़ नगराद्भगदत्तसुतो नृपः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपतेः पुरम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिमन्त्र्य शरं दीप्तं विधूममिव पावकम् |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिमन्युं त्रिभिर्वाणैर्विद्ध्वा वक्षस्यथानदत् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिमन्युं शरैः षष्ट्या रुक्मपुङ्खैरवाकिरत् |
९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिमन्युर्नृसिंहस्य फल्गुनस्य सुतोऽभवत् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिवाद्य कृपं राजा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिवाद्य गुरून्सर्वांस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजमपश्यत ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
सोऽभिवाद्य महात्मानमृषिं द्वैपाय़नं मुनिम् |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिवीक्ष्य नरौघाणां स्थानमप्रतिमं महत् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिवीक्ष्य हतां माय़ां माय़ावी माय़यैव हि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्येन वासवः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
सोऽभिषिक्तो मघवता स्वय़ं शक्रेण भारत |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिषिक्तो महाप्राज्ञः प्राप्य राज्यं युधिष्ठिरः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
सोऽभिसृत्य तु मान्धाता वसुहोमं नराधिपम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सोऽभ्यगच्छत यक्षेन्द्रमाहूतः पृथिवीपते |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन्निय़तः शुचिः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभ्यगात्सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सोऽभ्यद्रवद्भीष्ममनीकमध्ये; क्रुद्धो महेन्द्रावरजः प्रमाथी |
८८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाप्य राजानं व्रह्मचर्याय़ दीक्षितः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभ्ययात्कृतवर्माणं धृतराष्ट्रसुतो नृपः |
२९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभ्ययात्पुत्रशोकार्तः पुत्रशोकपरिप्लुतम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सोऽभ्यवर्तत सोदर्यान्माय़या मोहय़न्वलम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
सोऽभ्यविध्यत्ततो द्रोणं षष्ट्या साश्वरथध्वजम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सोऽभ्यविध्यन्महात्मानं वेगेनाभ्यपतच्च गाम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
सोऽभ्यसूय़ापलाशो हि पुरादुष्कृतसारवान् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
सोऽभ्युद्धरत्विमां शक्तिमथ वा कम्पय़त्विति |
१० क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
सोऽभ्युपेक्षितवानेतमनय़ं मधुसूदनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
सोऽभय़ं सर्वभूतेभ्यः सम्प्राप्नोति महामुने ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सोऽमर्षवशमापन्नस्तुलाधारदिदृक्षय़ा |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
सोऽमर्षितस्तमप्याजौ प्रतिचक्रेऽपसव्यतः ||
४९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽमृष्यमाणः कर्णस्य निषङ्गस्यावलम्वनम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
सोऽमृष्यमाणस्तद्वाक्यं समुद्धरणनिश्चितः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽमृष्यमाणो वचसाभिमृष्टो; महारथेनातिरथस्तरस्वी |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
सोऽरिय़त्नार्पितैर्वाणैराचितो द्विरदो वभौ |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सोऽर्करश्मिनिभांस्तीक्ष्णांस्तोमरान्वै चतुर्दश |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽर्चितः पाण्डवैः सर्वैर्महर्षिर्वेदपारगः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽर्चितो धृतराष्ट्रेण पूजितश्च महाय़शाः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
सोऽर्जुनं प्रमुखे यान्तं पाञ्चाल्यः कुरुनन्दन |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽर्जुनेन परामृष्टः पर्यदेवय़दार्तवत् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सोऽर्जुनेन समाज्ञप्तो देवलोके तदा नृप |
१४ क