द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विश्वकर्मकृतं दिव्यमुपजह्रुर्वरासनम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मय़ी |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मकृता दिव्या नानारत्नविभूषिता |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि च भूषितान् ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु यस्य ते रूपमीदृशम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
विश्वक्षेत्रं प्रजावीजं लिङ्गमाद्यस्त्वनिन्दितः |
१३९ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वजिता चेष्ट्वा वनं प्रविवेश ||
११ घ
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
विश्वजित्प्रतिशौरिश्च वृषाण्डो विष्करो मधुः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
विश्वभुक्सर्वगो देवो वान्धवो भक्तवत्सलः |
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
विश्वभुक्सर्वभूतानामन्तरात्मन्नय़ोनिज ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
विश्वमूर्तिरमेय़ात्मा भगवानमितद्युतिः ||
३९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् |
९० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
विश्वमूर्धा विश्वभुजो विश्वपादाक्षिनासिकः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
विश्वरूपं विरूपाक्षं वहुरूपमुमापतिम् ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
विश्वरूपं विरूपाक्षं वहुरूपमुमापतिम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
विश्वरूपः सुरूपश्च विरूपोऽथ महाशिराः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
विश्वरूपः स्वय़ंश्रेष्ठो वलवीरो वलो गणः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
विश्वरूपविनाशेन वृत्रासुरवधेन च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वरूपो महादेवः सर्वमेधे महामखे |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वलोपः प्रवर्तेत भिद्येरन्सर्वसेतवः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
विश्वलोपः प्रवर्तेत यदि राजा न पालय़ेत् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
विश्वसत्यप्रमत्तेषु मूढचेता नराधमः ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतानि गच्छति |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विश्वसृग्यत्र गोविन्दः पृतनारिस्तहार्जुनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
विश्वस्तं भय़मन्वेति नापरीक्ष्य च विश्वसेत् ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वस्तं मामय़ं पापो दग्धुकामः पुरोचनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
विश्वस्तः शक्यते भोक्तुं यथाकाममुपस्थितः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
विश्वस्तवदविश्वस्तस्तेषु वर्तेत सर्वदा |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चय़न्तः पुरोचनम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
विश्वस्तस्यैति यो दारान्यश्चापि गुरुतल्पगः |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतसः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वस्तानिव संलक्ष्य हर्षं चक्रे पुरोचनः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विश्वस्तास्त्वाशु वध्यन्ते वलवन्तोऽपि दुर्वलैः ||
१८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वस्तेषु च भूतेषु कल्पते सर्व एव हि ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वस्य जगतो गोप्ता भविष्यति सुतो मम ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वाश्चैव महावलाः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वाँल्लोकान्व्याप्य विष्टभ्य कीर्त्या; विरोचते द्युतिमान्कृत्तिवासाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
विश्वाची च घृताची च पञ्चचूडा तिलोत्तमा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ||
६७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
महेश्वर उवाच
विश्वात्मा सर्वगश्चैव वहुमाय़श्च विश्रुतः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
द्रोण उवाच
विश्वानादाय़ पुनरुत्सर्गकाले; सृष्ट्वा वृष्ट्या भावय़सीह शुक्र ||
१६ ख