शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
सोऽव्रवीद्गौतमोऽस्मीति व्राह्म नान्यदुदाहरत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
सोऽव्रवीद्दुःखसन्तप्तो भृशमश्रूणि वर्तय़न् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीद्भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
सोऽव्रवीद्भ्रातरं ज्येष्ठमुपस्पृश्याभिवाद्य च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
सोऽव्रवीद्यक्ष्मैनमावेक्ष्यतीति ||
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽव्रवीद्वाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीद्विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम् |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीन्मातरं कुन्तीमुपेत्य भरतर्षभ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
सोऽव्रवीन्मातरं धीमान्वेपमानः कृताञ्जलिः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीन्मेघधीरेण स्वरेण वदतां वरः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
सोऽशक्नुवन्विशेषाय़ समाहूय़ वृहस्पतिम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
सोऽशक्यतां च विज्ञाय़ तेषामग्रेण भारत |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
सोऽशपत्कुपितोऽस्मांस्तु व्राह्मणः क्षत्रिय़र्षभ |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सोऽशेत कृष्णेन हतः परासु; र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽश्मवर्षं महावेगैरिषुभिः पाकशासनिः |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽश्वमेधसहस्रेण वाजपेय़शतेन च |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽश्वमेधेश्वरं राजन्रोचमानं सहानुजम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
सोऽश्ववन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽश्ववेगानिलवलः शरार्चिस्तलनिस्वनः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
सोऽसि कर्ण तथा जातः पाण्डोः पुत्रोऽसि धर्मतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
सोऽसृजत्प्रथमं देवो महान्तं नाम नामतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽसृजद्वाय़ुमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
सोऽसौ पार्थो व्यतिक्रान्तो मिषतस्ते महाद्युते |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
सोऽस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो रामशिष्यः प्रतापवान् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
सोऽस्मदर्थे व्रतं साधु चर त्वं व्रह्महिंसनम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
सोऽस्मदावसथं गत्वा शय़्याश्चास्तरणानि च |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
सोऽस्मा अर्थमिमं प्राह पित्रे मे भरतर्षभ ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽस्माकं वैरपुरुषो दुर्मन्त्रिप्रग्रहं गतः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
सोऽस्माच्च हीय़ते लोकात्क्षुद्रभावं च गच्छति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालय़ोगा; त्कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकष्टे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽस्मानतर्कय़द्भोक्तुमथाभ्येत्य वचोऽव्रवीत् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽस्मानुत्थापय़ामास वाक्येनानेन पक्षिराट् |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
सोऽस्मान्पाहि युधां श्रेष्ठ स्कन्दो देवानिवाहवे ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
सोऽस्मि कृष्ण तथा जातः पाण्डोः पुत्रोऽस्मि धर्मतः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
सोऽस्मि क्षीणवलः कर्ण क्षीणशस्त्रश्च संय़ुगे ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सोऽस्मि जातः कुले श्रेष्ठे व्राह्मणानां सुपूजिते |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सोऽस्मि वाच्यस्त्वय़ा राजन्पूर्वमेव समागमे |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽस्मि संशय़मापन्नस्त्वय़ि शान्ते कथं भवेत् |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽस्मिंस्तीर्थवरे राजन्सरस्वत्याः समाहितः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽस्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये जालेनापिहितश्चरन् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं कापथमारूढः पश्य दैवमिदं मम ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
सोऽहं कापुरुषः कृत्वा मित्राणां क्षय़मीदृशम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
सोऽहं कितवमातेव द्वय़ोरपि महामुने |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं क्रिय़ावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः ||
६७ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
सोऽहं क्षत्रवलाद्धीनो व्रह्मतेजः प्रपेदिवान् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं गन्तुमभीप्सामि पुरीं द्वारवतीं प्रति |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
सोऽहं जातो महावाहो भीष्मः परपुरञ्जय़ः |
३८ क