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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
सोऽहं जानन्व्रह्मतेजो यथाव; न्न संवर्तं गन्तुमिच्छामि शक्र ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
सोऽहं जीवितमाकाङ्क्षन्नभक्षस्यापि भक्षणम् |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं ज्ञात्वा रणे तस्य कर्म दृष्ट्वा च फल्गुन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं जय़े चैव पराजय़े च; निःश्रेय़सं नाधिगच्छामि किञ्चित् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र यातो वृकोदरः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र सैन्धवको नृपः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
शेष उवाच
सोऽहं तपः समास्थाय़ मोक्ष्यामीदं कलेवरम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
व्यास उवाच
सोऽहं तस्य प्रसादेन देवस्य हरिमेधसः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सोऽहं तामखिलां वृत्तिं त्रिविधां मोक्षसंहिताम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
धृतराष्ट्र उवाच
सोऽहं तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतानि च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
सोऽहं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सोऽहं तेनैव वीरेण समरेष्वपलाय़िना |
२१ क
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
सोऽहं तौ च महात्मानौ चिन्तय़न्भ्रातरौ तव |
२० क
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राजं; स्त्वां शासितुमुपय़ातस्त्वरावान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
सोऽहं त्यक्ष्ये प्रिय़ान्प्राणान्पुत्रदारं विसृज्य च |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
अर्जुन उवाच
सोऽहं त्वां तत्र नेष्यामि यत्रैते वहुला ध्वजाः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
सोऽहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सोऽहं त्वय़ा त्वात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं त्वय़ि स्थितो ह्यद्य क्षमावति महात्मनि |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
सोऽहं त्वय़ेह विजितः सङ्ख्ये तापत्यवर्धन |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
सोऽहं दत्त्वा मघवते भिक्षामेतामनुत्तमाम् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
सोऽहं दुःखार्णवे मग्नो महत्यसुतरे भृशम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं द्रोणं स्वर्गगतं शल्यकर्णावुभौ तथा |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
सौदास उवाच
सोऽहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद्दोषमवाप्तवान् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं द्विषत्सैन्यमुदग्रकल्पं; विनाशय़िष्ये परमप्रतीतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्ममुपाह्वय़े |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
सोऽहं न पश्यामि परीक्षमाणः; कथं स्वस्ति स्यात्कुरुसृञ्जय़ानाम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं नाराय़णास्त्रेण महता शत्रुतापन |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
सोऽहं निर्जित्य समरे विजय़ं सहकेशवम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
सोऽहं पक्षैकदेशेन वहामि त्वां गतक्लमः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं परमदुष्कर्मा वसामि निरय़ेऽशुचौ |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमानः समन्ततः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वय़ि धर्मभृतां वर |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
सोऽहं पापः कृतघ्नश्च कृपणश्चानृतोऽपि च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
शुक उवाच
सोऽहं पितुर्निय़ोगात्त्वामुपप्रष्टुमिहागतः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं पुनः पुनर्याचे शिरसावनतोऽनघाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
सोऽहं प्रतिग्रहीष्यामि ददात्वेतां भवान्मम |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं; पाञ्चालानामधिपं चैव वृद्धम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
सोऽहं प्राणान्विमोक्ष्यामि कृत्वा यत्नमनुत्तमम् ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
सोऽहं प्राणान्विमोक्ष्यामि तथा परिजनो मम |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं प्रिय़ः सखा चास्मि धार्तराष्ट्रस्य धीमतः |
९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
सोऽहं भगवतीं याचे प्रणतः प्रिय़काम्यया |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं भरतशार्दूल भीमसेनपुरोगमैः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं भारं समाधास्ये त्वय़ि तं वोढुमर्हसि |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं भीष्मं गमिष्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं भीष्मं निहन्म्यद्य पाण्डवार्थाय़ दंशितः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
सोऽहं भृगोः सुदय़ितां भार्यामपहरं वलात् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहं मूर्धावसिक्तः सन्राजर्षिकुलसम्भवः |
३७ क