वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
वह्वाश्चर्यं महाराज दृश्यते तत्र पर्वते |
६ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
वह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
वह्वाश्चर्ये वने तेषां वसतामुग्रधन्विनाम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
वह्वाश्चर्यो हि देशः स श्रूय़ते द्विजसत्तम ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
वह्वाश्रय़ो वहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
वह्वाय़त्तं क्षत्रिय़ैर्मानवानां; लोकश्रेष्ठं धर्ममासेवमानैः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
वह्वीः संसरमाणो वै योनीर्हि द्विजसत्तम ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
वह्वीनां कीदृशं दानमल्पानां वापि कीदृशम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वह्वीनामुत्तमस्त्रीणां सीमन्तोद्धरणे तथा ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
वह्वीभिर्वुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
वह्वीस्तथान्या माय़ाश्च प्रय़ुक्तास्तेन रक्षसा |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
वह्वीस्तु संसरन्योनीर्जाय़मानः पुनः पुनः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
शक्र उवाच
वह्वीस्तु संसरन्योनीर्जाय़मानः पुनः पुनः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
वह्वेतत्समरे कर्म तव वालस्य पार्थिव ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
वह्व्यः कोट्यस्त्वृषीणां तु व्रह्मलोके वसन्त्युत |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
वह्व्यः प्रतिविधातव्याः प्रज्ञा राज्ञा ततस्ततः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वह्व्यो दृष्ट्वा शरीराणि क्रोशन्ति विलपन्ति च |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
वाक्क्रूराद्दण्डपारुष्यात्स प्राप्नोति महद्भय़म् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
वाक्क्रूरो दण्डपुरुषो यश्च स्यात्पारदारिकः |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
वाक्च हस्तौ च पादौ च पाय़ुर्मेढ्रं तथैव च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
वाक्च हस्तौ च पादौ च पाय़ुर्मेढ्रं तथैव च ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
वाक्चैव गुप्ता दानं च नैतान्यन्त्येषु भारत ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
वाक्चैव मधुरा प्रोक्ता श्रेय़ एतदसंशय़म् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
वाक्तीक्ष्णो निकृतिप्रज्ञो मोष्टा विश्वस्य सर्वशः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
वाक्तु शव्दविशेषार्थं गतिं पञ्चान्वितां विदुः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
वाक्प्रतोदेन तौ वीरौ प्रणुन्नौ तनय़ेन ते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
वाक्प्रवुद्धो हि संरागाद्विरागाद्व्याहरेद्यदि |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
वाक्यं च शृणु मे तात यत्ते वक्ष्ये हितं द्विज ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यं चोवाच |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
वाक्यं तु यो नाद्रिय़तेऽनुशिष्टः; प्रत्याह यश्चापि निय़ुज्यमानः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
वाक्यं न मे रोचते यत्त्वय़ोक्तं; यत्ते प्रिय़ं तत्क्रिय़तां नरेन्द्र |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
वाक्यं प्रणय़संय़ुक्तं ततः स्यां वशगा तव ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
वाक्यं प्रमाणं राजर्षे ममापि तव चैव हि ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यं यथावन्नृपतेः समग्र; मुवाच तान्स क्रमवित्क्रमेण ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
वाक्यं श्रुत्वा सहस्राक्षः खमेवारुरुहे तदा ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
वाक्यं हितं च पथ्यं च मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वाक्यं हितमुवाचेदमभिनीतार्थमर्थवत् ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यमभ्याददे कृष्णः सुदंष्ट्रो दुन्दुभिस्वनः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यमर्थवदव्यग्रमुक्तं धर्म्यमनुत्तमम् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यमाह महाप्राज्ञो महाशोकप्रपीडितम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम् ||
३३ ग
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
वाक्यानि मम गाथाभिर्गाय़माना दिशो दश ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वाक्यानि सुमहार्थानि परितप्यामि दुर्मतिः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
वाक्यानि सुहृदां हित्वा त्वमप्यस्यानुवर्तसे ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
वाक्यान्ते प्रापय़त्पार्थं दण्डधारान्तिकं प्रति ||
४ ख