वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याधय़ो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
व्यानः समानश्चैवोभौ तिर्यग्द्वन्द्वत्वमुच्यते ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
व्यानश्च तमुदानश्च भाषमाणमथोचतुः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
व्यानेन सम्भृतो वाय़ुस्ततोदानः प्रवर्तते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
व्यानोदानौ समानश्च पञ्चधा देहय़ापना ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
व्यापकं सर्वभूतेषु वर्ततेऽप्रतिघं मनः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
व्यापकः सगुणः सूक्ष्मः सर्वभूतगुणाश्रय़ः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
व्यापत्तिं कर्मणां दृष्ट्वा जुगुप्सन्ति जनाः सदा ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
व्यापन्नचेतसश्चैव शोकोपहतमन्यवः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन्पितरि संस्थिते ||
६२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
व्यापन्नेऽस्मिन्महत्यर्थे यन्नः श्रेय़स्तदुच्यताम् ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
व्यापारेण धृतात्मानं निवद्धं समवुध्यत ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा |
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
व्याप्तं चेदं जगत्सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
व्याप्तं जगदिदं सर्वं तेजसा तव दुर्जय़ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
व्याप्ता मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
व्याप्तास्वथाप्सु वृत्रेण रसे च विषय़े हृते |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
व्याप्ते ज्योतिषि वृत्रेण रूपेऽथ विषय़े हृते |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
व्याप्ते वाय़ौ तु वृत्रेण स्पर्शेऽथ विषय़े हृते |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
व्याप्तेय़ं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
व्याप्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
व्याप्य भूतानि चरते न चाय़मिति लक्ष्यते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात्पुरुष उच्यते ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
व्याप्य सर्वा दिशः पेतुर्गजाश्वरथपत्तिषु ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
व्याभाषमाणाश्चान्योन्यं न मे जीवन्विमोक्ष्यसे |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
व्यामिश्रेणैव वाक्येन वुद्धिं मोहय़सीव मे |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
व्यामिश्रय़द्रणे कर्णः पाण्डवं छादय़ञ्शरैः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
व्यामोहिते तु तनय़े वाह्लीकः समुपाद्रवत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
व्यामोहय़ं च तान्सर्वान्रथमार्गैश्चरन्रणे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
व्यामोहय़न्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचोरभय़ेषु च |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
व्यालम्वत महाराज प्राय़शः शस्त्रवेष्टितम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
व्यालम्वहस्तान्संरव्धान्सपक्षानिव पर्वतान् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
व्यालम्विपीतान्तपटश्चकाशे; घनो यथा खेऽचिरभापिनद्धः ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
व्यालरूपो विलावासी हेममाली तरङ्गवित् ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यालवक्त्राः शूलमुखाश्चण्डवक्त्राः शताननाः |
८२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
व्याली निर्मुच्यमानेव पपातास्य सहस्रधा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
व्यालैराचरितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यालैर्वापि महारण्ये भक्षिताः शूरमानिनः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
व्यालैश्च वनदुर्गान्ते स्त्रिय़ा च परमोग्रय़ा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यालैश्च विविधाकारैः शतशीर्षैः समन्ततः |
८७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
व्यालो भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जाय़ति मानुषः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
व्यालय़ज्ञोपवीती च लोहिताङ्गदभूषणः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
व्यावर्तय़े तत्र रथं नदीवेगमिवार्णवात् |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं; रजोविकीर्णाञ्चितपक्ष्मनेत्रम् |
१०३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
व्याविध्यत युधां श्रेष्ठः श्रीमांस्तव सुतं प्रति ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यावृत्तं लक्ष्म सोमस्य भविष्यति महद्भय़म् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
व्यावृत्तनय़नः क्रुद्धः प्रदहन्निव पाण्डवम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
व्यावृत्तमात्रे भगवत्युदीचीं; सूर्ये दिशं कालवशात्प्रपन्ने |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
व्यावृत्तेऽहनि राजेन्द्र पतिते जाह्नवीसुते |
२० क