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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मामनुकम्पसे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सौहृदेनाभिभाषे त्वा कच्चिन्मार्जार जीवसि |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
सौहृदेनाविशङ्क्योऽसि स्वस्ति प्राप्नुहि भूतय़े ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दं चोवाच वलभिदिय़ं कन्या सुरोत्तम |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दं श्रुत्वा ततो देवा वासवं सहिताव्रुवन् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्दः शाखो विशाखश्च नैगमेषश्च पृष्ठतः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वाय़ुवाहनः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय २१७
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दप्रसादजः पुत्रो लोहिताक्षो भय़ङ्करः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
स्कन्दशक्त्या यथा क्रौञ्चः पुरा नृपतिसत्तम ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २१७
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दस्य पार्षदान्घोराञ्शृणुष्वाद्भुतदर्शनान् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दस्य पार्षदैर्हत्वा भक्षिताः शतसङ्घशः ||
६८ ग
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दस्य य इदं जन्म पठते सुसमाहितः |
८० क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः ||
२५ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्दाय़ त्रीननुचरान्ददौ विष्णुर्महाय़शाः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्दाय़ ददतुः प्रीतावश्विनौ भरतर्षभ ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद्ग्रहः |
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
स्कन्दो मय़ूरमास्थाय़ स्थितो देव्याः समीपतः |
१४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत्कदनं महत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
स्कन्धदर्शनमात्रं तु तिष्ठेय़ुर्वा समीपतः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
स्कन्धदेशे स्थितैर्वाणैः शिखण्डी च रराज ह |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
स्कन्धदेशेऽसृजच्चास्य स्रजं परमशोभनाम् |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धभूय़िष्ठकाय़त्वात्तनुमध्यकटीतटम् ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहाय़सा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
स्कन्धवान्मेघसङ्काशः शीतच्छाय़ो मनोरमः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धावाराणि सर्वाणि निवर्त्यारुरुहेऽचलम् ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धावारेण महता कुरुक्षेत्रं जगाम ह ||
३३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धावारेण महता प्रय़युः पाण्डुनन्दनाः ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धे निक्षिपतां वाहुं शान्तय़े भरतर्षभ ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्धे परशुमादाय़ सत्यवान्प्रस्थितो वनम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
शृङ्ग्यु उवाच
स्कन्धे मृतमवास्राक्षीत्पन्नगं राजकिल्विषी ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धेमुखा महाराज तथा ह्युदरतोमुखाः ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
स्कन्नत्वात्स्कन्दतां चाप गुहावासाद्गुहोऽभवत् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
स्कन्नत्वात्स्कन्दतां चापि गुहावासाद्गुहोऽभवत् ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण प्रतिगृह्य सः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्नमात्रं च तद्रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
स्खलितार्थं पुनस्तात सन्त्यजन्त्यपि वान्धवाः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
स्तनं तु दक्षिणं भित्त्वा व्रह्मणो नरविग्रहः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
स्तनतां कूजतां चैव मनुष्यगजवाजिनाम् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
स्तनतां च मनुष्याणां संनद्धानां विशां पते ||
७० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
स्तनतां च मनुष्याणामपरेषां च कूजताम् |
१२० क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ |
११० क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
स्तनावपतितौ वाला सहितावभिवर्षती |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्तनौ पीनाय़तश्रोणी सहितावभिवर्षती |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स्तन्यस्य मातुर्मधुसर्पिषो वा; माध्वीकपानस्य च सत्कृतस्य |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
स्तनय़ित्नोश्च निर्घोषः श्रूय़ते वहुशस्तथा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्तम्भतोरणभग्नाश्च पेतुस्तत्र निशाचराः ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
स्तम्भान्कनकचित्रांश्च तोरणानि वृहन्ति च |
१४ क