विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन वाणेन समर्पितेन; जाम्वूनदाभेन सुसंशितेन |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन वारणो राजन्मर्मण्यभिहतो भृशम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन विजय़स्तूर्णमस्यन्विद्धः करे भृशम् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स तेन विवभौ द्रौणिरूर्ध्वरश्मिर्यथा रविः ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
स तेन संवृतो वीरो रथेनामित्रकर्शनः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
स तेन समनुज्ञातो व्रह्मणा गृहमेय़िवान् ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन सर्वसैन्येन भीमेन कुरुनन्दनः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन सह सङ्गम्य रेमे पार्थो निरामय़ः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स तेन सहितस्तस्थावरुणेन यथा रविः ||
१४ ग
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन सहितो राजन्सव्यसाची परन्तपः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
स तेन सार्थेन सह प्रय़यौ सागरं प्रति ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
स तेन सुसुखोष्णेन तस्या हस्तसुखेन च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
स तेनाढ्यो महाय़ोगी तपसा च धनेन च |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
स तेनातिप्रहारेण व्यथितो विह्वलन्निव |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेनातिभृशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दनः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
स तेनातिभृशं विद्धः प्रेक्ष्य भीष्मः शिखण्डिनम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स तेनादित्यरूपेण दिव्येनाद्भुतकर्मणा |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स तेनानेकतारेण चर्मणा कृतहस्तवत् |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स तेनाभिहतः सङ्ख्ये भीष्मः कुरुपितामहः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
स तेनाभिहतो दीनो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
स तेनाभिहतो राजन्मूर्छामाशु समाविशत् |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तमः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
स तेनावेक्षितः कुम्भः पूर्ण एवाभवत्तदा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
स तेनासुखमाप्नोति परत्र च विहन्यते |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स तेनास्त्रेण शैलेन्द्रः क्षिप्तः क्षिप्रमनश्यत ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तेनैवमुक्तः प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रिय़ां नापश्यत् ||
११० क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
स तेषां छिद्रमन्विच्छन्प्रद्रुतो भय़पीडितः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
स तेषां नरदेवानां सकाशे परिदेवय़न् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
स तेषां प्रवरान्योधान्हस्त्यश्वरथसादिनः |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषां प्रेक्षतामेव श्रीमतां दृढधन्विनाम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
स तेषां प्रेत्यभावे च प्रेत्यजातौ विनिश्चय़े |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
स तेषां रथिनां वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
स तेषां रथिनां वीरो भीष्मः शान्तनवो युधि |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषां रूपमालोक्य भोगिनामिव जृम्भताम् |
१८ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषां विधिवत्कृत्वा प्रेतकार्याणि पाण्डवः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
स तेषां विपरिभ्रंशे भ्रश्यते जीवितादपि ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषामतिदुःखोऽभून्निवासः प्रथमेऽहनि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषामनृणो भूत्वा गत्वा लोकेष्ववाच्यताम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषामभवद्योद्धा तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
स तेषामस्त्रवेगं तं प्रतिहत्यास्त्रमाय़या |
११ क
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
स तेषु तर्पय़ामास पितॄन्भृगुकुलोद्वहः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेषु तीर्थेष्वभिषिक्तगात्रः; कृष्णासहाय़ः सहितोऽनुजैश्च |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
स तेषु रुधिराम्भस्सु ह्रदेषु क्रोधमूर्च्छितः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स तेषु विसृजन्वाणान्भीमो नागेष्वशोभत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
स तेष्वात्मानमुद्दिश्य पित्र्यं चक्रे यथाविधि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
स तेऽक्षहृदय़ं दाता राजाश्वहृदय़ेन वै |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
स तेऽरण्येषु वोद्धव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
स तेऽय़ं पुरुषव्याघ्र नय़स्वैनं गृहान्तिकम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतः पार्थो भ्रातृभिः कृतनिश्चय़ैः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो युधि सुदुर्जय़ैः |
१६ क