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शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
स्त्रीपुंसोर्वापि भगवन्सम्वन्धस्तद्वदुच्यते ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीपुंसय़ोः सम्प्रय़ोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
स्त्रीपूर्वको ह्यसौ जातस्तस्माद्वर्ज्यो रणे मय़ा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
स्त्रीपूर्वाः काण्डपृष्ठाश्च यावन्तो भरतर्षभ |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीपूर्वो यो नरव्याघ्रो यः स वेद गुणागुणान् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
स्त्रीप्रत्ययो हि वो धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
स्त्रीभावात्कथमश्वं तु पुनरारोढुमुत्सहे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीभावाद्वालभावाच्च चिन्तय़न्ती पुनः पुनः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
स्त्रीभावे परिनिर्विण्णा पुंस्त्वार्थे कृतनिश्चय़ा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
स्त्रीभावेन च मे गाढं मनः शान्तमुमापते ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
स्त्र्यु उवाच
स्त्रीभावेन हि तुष्टोऽस्मि गम्यतां त्रिदशाधिप ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
स्त्रीभिः परिवृतो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः |
११० क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्षैर्भोज्यैश्च पुष्कलैः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः पुरुषस्याथ येऽभवन् ||
३८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः स्नेहस्तेभ्योऽधिकः कथम् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
स्त्रीभूतस्य हि ये जातास्ते मे जीवन्तु वासव ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
स्त्रीभोगानां विशेषज्ञः शास्त्रधर्मार्थतत्त्ववित् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीमध्य उक्तस्तेनासौ तद्वाक्यमभय़ङ्करम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
स्त्रीमध्यमिव गाहन्ति दैवं हि वलवत्तरम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
स्त्रीमन्तश्च तथा षण्ढा विचित्रः कालपर्ययः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
स्त्रीमय़ं मनसा ध्यात्वा नास्मै प्राहरदच्युतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
स्त्रीरक्षिभिश्च सज्जन्ते तुल्यवेषा भवन्ति च ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
स्त्रीरत्नं दुष्कुलाच्चापि विषादप्यमृतं पिवेत् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
स्त्रीरूपमद्भुतं कृत्वा दानवानभिसंश्रितः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्त्रीलिङ्गं धारय़ामास स्थूणो यक्षो नराधिप |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्त्रीलिङ्गं धारय़िष्यामि त्वदीय़ं पार्थिवात्मजे |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
स्त्रीवदेष विभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
स्त्रीवर्षवरभूय़िष्ठं वृद्धामात्यैरधिष्ठितम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीवुद्ध्या न विशिष्येते ताः स्म रक्ष्याः कथं नरैः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीवृद्धवाले च सुसंनिविष्टे; यथार्हतः कुशलं पर्यपृच्छत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
स्त्रीवेषमद्भुतं कृत्वा सहसान्तरधीय़त ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
स्त्रीशूद्रपतितांश्चापि नाभिभाषेद्व्रतान्वितः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
स्त्रीषु क्रीडाविहारेषु नित्यमस्यास्वतन्त्रता |
१३९ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीषु क्लीवान्निय़ुञ्जीत क्रूरान्क्रूरेषु कर्मसु ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
स्त्रीषु क्षान्तासु दान्तासु देवद्विजपरासु च |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातय़ेद्व्राह्मणेषु च |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय़ जाय़ते वर्णसङ्करः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्याय़े शत्रुसेविषु |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
स्त्रीषु वल्लभतां याति वश्याश्चास्य भवन्ति ताः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीय़ेषु नपुंसकम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान्क्षन्तुमर्हति |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीसङ्घाः क्षत्रसङ्घाश्च यानसङ्घान्समास्थिताः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्च सर्वार्थानां प्रदर्शकः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
स्त्रीसमक्षमहं दीनो वद्धः शत्रुवशं गतः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
स्त्रीसहस्रानुचरिते स नरः सुखमेधते ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
स्त्रीसहस्रावृतः श्रीमानास्ते ज्वलितकुण्डलः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीसहस्रैः परिवृतं पश्यामीहोर्ध्वरेतसम् ||
२० ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्रीसहस्रैः परिवृता वधूभिश्च सहस्रशः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः |
६ क