उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
स्त्रीस्वरूपो महाराज तस्थौ व्रीडासमन्वितः ||
४० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्र्यध्यक्षांश्चाव्रवीद्राजा यानानि विविधानि मे |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
स्त्र्यध्यक्षय़ुक्ताः प्रय़युर्विसृजन्तोऽमितं वसु ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शय़नानि च |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद्वैरस्य यातना ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्य समन्ततः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
स्थण्डिले शय़नं योगः शाकपर्णनिषेवणम् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्थण्डिले शय़मानानां गृहाणि शय़नानि च |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
स्थण्डिले शय़मानानां गृहाणि शय़नानि च |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
स्थण्डिलेपुर्वनेपुश्च स्थलेपुश्च महारथः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
स्थपतिर्वुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
स्थलजा जलजा ये च पशवः केचन प्रभो |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
स्थलमापस्तथाकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
स्थविरः सन्परं शक्त्या घटे दुर्योधनाहवे |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्थविरा वालमतय़ो वालाः स्थविरवुद्धय़ः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
स्थविराणामपि स्त्रीणां वाधते मैथुनज्वरः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
स्थविरेषु स योक्तव्यो राजभिर्धर्मचारिभिः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
स्थविरोऽस्मि कुरुश्रेष्ठ मन्दप्राणविचेष्टितः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
स्थाणुं स्कन्दं तथा लक्ष्मीं विष्णुं व्रह्माणमेव च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
स्थाणुकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटाः प्राविशदच्युतः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
स्थाणुभूतो निराहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रव्धः कुरु वै कृतिम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स्थाणुर्भवश्च भगवान्रुद्रा एकादश स्मृताः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थाणुर्भवश्च भगवान्रुद्रास्तत्रावतस्थिरे ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
स्थाणुवच्चाप्यकम्पः स्याद्गिरिवच्चापि निश्चलः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
स्थाणोर्वृषस्य सदृशं स्कन्धनेत्रगतिस्वरैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
स्थाण्वश्मकण्टकवतीं व्याघ्रसिंहगजाकुलाम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स्थातव्यं च वशे तस्य स ते छेत्स्यति संशय़म् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
स्थातव्यं तु त्वय़ा धर्मे यथा व्रूय़ां सुमध्यमे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स्थातव्यमिति तिष्ठामि पीड्यमानोऽभिमन्युना ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
स्थातव्यमिति तिष्ठामि रणे सम्प्रति मानद |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्ववाणप्रपीडितः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
स्थाता नः समय़े तस्मिन्धृतराष्ट्र इति प्रभो |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
स्थाता नः समय़े तस्मिन्पितेति कृतनिश्चय़ाः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स्थातुं त्वद्विषय़े राजन्न शक्ष्यामि त्वय़ा सह ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स्थातुमुत्सहते कश्चिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
स्थानं च प्रतिपन्नोऽसि कर्मणा स्वेन निर्जितम् |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स्थानं तथा दुर्गतिभिस्तु तस्य; प्रजाविसर्गान्सुवहून्वदन्ति ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
स्थानं देहवतामस्ति इत्येवमनुशुश्रुम ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
स्थानं नारोचय़ंस्तत्र ततस्ते ह्रदमभ्ययुः ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
स्थानं पुनर्यो लभते निषङ्गा; त्तेनापि दण्डः सहितव्य एव ||
८७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं चैवाधिगच्छति |
७३ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
स्थानं विरजसं रम्यं यत्राग्निर्नित्यमिध्यते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
स्थानं वृद्धिः क्षय़श्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डजः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स्थानं हि कल्पय़ित्वा च रथोपस्थे ध्वजस्य मे |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्थानमस्य क्षितिपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो |
६ क