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शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
स्थिरवुद्धिरसक्तात्मा तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्थिरव्रताः सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रताः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
स्थिरा वुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
स्थिरा वुद्धिर्नरेन्द्रस्य धार्तराष्ट्रस्य मानद |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
स्थिरा वुद्धिर्नरेन्द्राणामासीद्व्रह्मविदां वर |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
स्थिरा वुद्धिर्हि द्रोणस्य न पार्थो वक्ष्यतेऽनृतम् |
९५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
स्थिरां कृत्वा मतिं युद्धे भूत्वा संशप्तका मिथः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरां कृत्वा वुद्धिमस्य प्रिय़ाण्युक्त्वा च भारत |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
स्थिरीकृत्येन्द्रिय़ग्रामं मनसा मिथिलेश्वर |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
पितामह उवाच
स्थिरीभवत कृष्णोऽय़ं सर्वपापप्रणाशनः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
स्थिरीभूताश्च युध्यध्वं दर्शय़न्तोऽस्त्रलाघवम् ||
१६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
स्थिरीभूय़ महाराज शृणु सर्वं यथातथम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
स्थिरीवूता महात्मानः प्रत्यगच्छन्धनञ्जय़म् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
कर्ण उवाच
स्थिरो भव महाराज जितान्विद्धि च पाण्डवान् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
स्थिरो भव यथा राजन्हिमवानचलोत्तमः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरो भव सहामात्यो विमर्दो भविता महान् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि साय़कानशनीनिव |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५६
सञ्जय़ उवाच
स्थिरो भूत्वा महाराज सर्वलोकक्षय़ोदय़म् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामि दुःखादेतद्व्रवीमि ते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
स्थीय़तां नेह भेतव्यं यावत्तपति भास्करः |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
स्थीय़तां यावदादित्यः किं वः क्रव्यादभाषितैः ||
१०० ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
स्थीय़तामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पय़स्विनी |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्यवसत्तदा |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्थूणस्य यक्षस्य निशाम्य वेश्म; स्वलङ्कृतं माल्यगुणैर्विचित्रम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्थूणस्यार्थे कुरुष्वान्तं शापस्येति पुनः पुनः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
स्थूणाकर्णं पाशुपतं च घोरं; तथा व्रह्मास्त्रं यच्च शक्रो विवेद ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
स्थूणाकर्णमय़ोजालं शरवर्षं शरोल्वणम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थूणाकर्णेन्द्रजालं च सौरं चापि तथार्जुनः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
स्थूणाकर्णेन्द्रजालेन पार्थ पाशुपतेन च |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
स्थूणाश्मानं वाजिरथप्रधानां; ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
स्थूणासहस्रैर्वृहतीं शतद्वारां सभां मम |
४६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
स्थूणाहस्ताः खड्गहस्ताः सर्पोच्छ्रितकिरीटिनः |
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
स्थूणो यक्षो निरुद्वेगो भवत्विति महामनाः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
स्थूलकेश इति ख्यातः सर्वभूतहिते रतः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने वन्धुवर्जिताम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थूलपृष्ठा ह्रस्वपृष्ठाः प्रलम्वोदरमेहनाः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
करालजनक उवाच
स्थूलवुद्ध्या न पश्यामि तत्त्वमेतन्न संशय़ः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
स्थूलस्फिग्गूढनाभिश्च शिथिलोपचय़ो महान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
स्थूलस्फिग्विकचो रूक्षः श्वचक्रपरिवारितः ||
१०९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
स्थूलाक्षः शकलाक्षश्च कण्वो मेधातिथिः कृशः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थूलोदराः कृशाङ्गाश्च स्थूलाङ्गाश्च कृशोदराः |
८३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
स्थैर्यमत्र कथं ते स्यात्स त्वं निःसंशय़ं कुरु |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
स्नात एव तदाप्नोति गङ्गाय़मुनसङ्गमे ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
युधिष्ठिर उवाच
स्नातं कृताह्निकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
स्नातकं च प्रिय़ं चाहुः षडर्घ्यार्हान्नृपं तथा ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
स्नातकव्रतिनस्ते तु वाहुशस्त्रा निराय़ुधाः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
स्नातकव्रतिनो राजन्व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा विशः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
स्नातकानां सहस्रस्य स्वर्णनिष्कानदापय़त् |
६० ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
स्नातकानाममात्यानां राज्ञां च मम शासनात् |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
स्नातकानामिदं शास्त्रं वाच्यं पुत्रानुशासनम् ||
१५ ग