आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
स्नेहात्संमोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
स्नेहात्संवासजान्मन्ये सूदमेषा शुचिस्मिता |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
स्नेहादमर्षं सहते सदैव; स सोमदत्तः पूजनीय़ो मतो मे ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी वलमवाप्नुय़ात् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहान्नरवरो नूनमविश्वासाद्वनस्य च |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स्नेहान्सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
स्नेहाय़तननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहे नवद्धस्य न सन्ति तानी; त्येवं स्वय़म्भूर्भगवानुवाच |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
स्नेहो रागश्च तन्द्री च मोहो द्रोहश्च केवलः |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्रं सीदति चाच्युत ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
स्पर्धते च मय़ा विप्र सदा वै स हि पार्थिवः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
स्पर्धते वासुदेवेन यो वै नित्यं रणे रणे ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
स्पर्धते सततं स स्म देवराजेन पार्थिवः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्पर्धते सर्वदेवैर्यः कालोपहतचेतनः |
६३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्धते स्म रणे नित्यं दुहितुः पुत्रको मम ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
स्पर्धते हि महेष्वासो नित्यं द्रोणसुतेन यः ||
२७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
स्पर्धते हि सदा नित्यं सर्वेण जगता सह |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
स्पर्धते हि सदात्यर्थं सूतपुत्रो मय़ा रणे ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः |
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
स्पर्धमानस्य शक्रेण पश्येदं यज्ञवास्त्विह ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
स्पर्धमानाः समाजग्मुर्जिघांसन्तोऽर्जुनात्मजम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्धमानास्तदान्योन्यं निषेदुः सर्वपार्थिवाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
स्पर्धा निहन्ति वै व्रह्मन्साहता हन्ति तं नरम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
स्पर्धां जहि महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत्परम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्धां तपःकृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
स्पर्धिनश्चैव ये केचित्तान्युक्त उपधारय़ ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
स्पर्धिनस्ते महेष्वासाः कृतय़त्ना धनुर्धराः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स्पर्ध्यास्तरणसंस्तीर्णं ददुस्ताः परमस्त्रिय़ः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
स्पर्ध्यास्तरणसंस्तीर्णं सर्वतोभद्रमृद्धिमत् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्धय़ा च वलोन्मत्तौ तावुभौ सूतपाण्डवौ |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
स्पर्धय़ा हव्यवाहानां निघ्नन्त्येते हरन्ति च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
स्पर्श एवाधिभूतं तु पवनश्चाधिदैवतम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
स्पर्शं तनुर्वेद रसं तु जिह्वा; घ्राणं च गन्धाञ्श्रवणे च शव्दान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
स्पर्शं वाय़ुगुणं विद्यात्सर्वभूतेषु सर्वदा ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
स्पर्शनं चेन्द्रिय़ं विद्यात्तथा स्पर्शं च तन्मय़म् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
स्पर्शनेभ्यस्तथा वाय़ुः प्राणापानव्यपाश्रय़ः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत् ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
स्पर्शरूपरसाद्येषु सङ्गं गच्छन्ति वालिशाः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
स्पर्शश्च गन्धश्च विशुद्धता च; श्रीः सौकुमार्यं प्रवराश्च नार्यः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
स्पर्शा गन्धा रसाश्चैव विपरीता महीपते ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
स्पर्शात्तनुं रूपगुणात्तु चक्षु; स्ततः परं पश्यति स्वं स्वभावम् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
स्पर्शात्सञ्जाय़ते चापि गन्धादपि च जाय़ते |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
स्पर्शान्कृत्वा वहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स्पर्शान्सर्वांस्तथा तन्द्रीं दुर्जय़ां नृपसत्तम ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
स्पर्शे चाभ्यवहार्ये चाप्युपांशुर्विविधः स्मृतः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्च तत् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
स्पर्शेन च न तत्स्पृश्यं मनसा त्वेव गम्यते ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
स्पर्शेन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्राय़ते च यत् |
१३ क