आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
स्पशैर्नो घातय़ेत्सार्वान्राज्यलुव्धः सुय़ोधनः ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
स्पृश मां पाणिना भूय़ः परिष्वज च पाण्डव |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
स्पृशंश्चैव प्रतिष्ठेत न चाप्यार्द्रेण पाणिना ||
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
स्पृशतां व्राह्मणं गां च पादेनाग्निं च यां लभेत् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
स्पृशतु त्वां समाश्लिष्य पुत्रोऽय़ं प्रिय़दर्शनः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
स्पृशते सोऽपि पाप्मानं सद्य एवापमार्जति ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्पृश्यमाना करैः शीतैः पाण्डवैश्च मुहुर्मुहुः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
स्पृश्याच्छुभं कश्चिदकृत्यकारी; श्वा वै पुरोडाशमिवोपय़ुङ्क्षीत् |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
स्पृष्टमात्रा तु पद्भ्यां सा गरुडेन वलीय़सा |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
स्पृष्टवन्तं शरीरं मां शववाहमिवाशुचिम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्पृष्टस्य च त्र्यम्वकेन फल्गुनस्यामितौजसः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
स्पृष्टा हि मर्त्येन ततः समुद्र; मेषा वेदी प्रविशत्याजमीढ ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
स्पृष्टानि येषां गाङ्गेय़ैस्तोय़ैर्गात्राणि देहिनाम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
स्पृष्ट्वा करैर्लोहितरक्तरूपः; सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
अलर्क उवाच
स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान्स्पर्शांस्तानेव प्रतिगृध्यति |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
स्पृष्ट्वा नाकम्पय़त्क्रुद्धो मैनाकमिव पर्वतम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
स्पृष्ट्वा पद्मदलाभाभ्यां पाणिभ्यामग्रतः स्थिता ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
उमो उवाच
स्पृहा भवति मे नित्यं तपोवननिवासिषु ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
स्पृहापाशान्विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
स्पृहामोहाभिमानेषु लोकः सक्तो विमुह्यति ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
स्पृहास्यान्तर्हिता चैव विदितार्था च कर्मणा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
स्पृहय़न्ति च भुक्तान्नं तेषु दत्तं महाफलम् ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
स्पृहय़ामि द्विजातीनां येषां व्रह्म परं धनम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
स्पृहय़ाम्यद्य निर्वेदात्पुरुषाणां सचक्षुषाम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधय़िष्यसि ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
स्प्रष्टव्यमधिभूतं च विद्युत्तत्राधिदैवतम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
स्फटिकविमलकेतुं तापनं शात्रवाणां; रथवरमधिरूढः सञ्जहारारिसेनाम् ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद्वृषपर्वणः |
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स्फाटिकं तलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कय़ा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
स्फाटिकैर्वज्रसारैश्च स्तम्भैः सुकृतवेदिकम् |
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स्फिग्देशेनोपविष्टः स दोर्भ्यां विष्टभ्य मेदिनीम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
स्फीतं दुर्योधनाय़ैव सम्प्रदद्यामरिन्दम ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्फीतं राष्ट्रं महावाहो पितृपैतामहं महत् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
स्फीतमाक्रम्य ते राष्ट्रं राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
स्फीतसस्यसुखे काले कल्यः सत्त्ववतां वरः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
स्फीतस्य वृष्णिवंशस्य भर्ता गोप्ता च माधवः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स्फीतांश्च शालिय़वसैर्हंससारससेवितान् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
स्फीताञ्जनपदांश्चान्यानजय़त्कुरुनन्दनः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्फीतोत्सवमनाधृष्यमासेदुश्च गिरिव्रजम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
स्फुटिताक्षा विशीर्णाश्च विप्लुताश्च विचेतसः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
स्फुरतश्च महाकाय़ान्गतसत्त्वांश्च राक्षसान् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
स्फुरतां प्रतिपिष्टानामश्वानां शीघ्रसारिणाम् |
७० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स्फुरतो वेपमानांश्च शमितेव पशून्मखे ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
स्फुरिष्यति समुद्भ्रान्तं विद्युदम्वुधरे यथा ||
११ ख