आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तस्ताः स्त्रिय़ः प्रत्युवाच |
९० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तस्ताञ्शिष्यान्प्रत्युवाच |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन; द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः |
१८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स एवमुक्तस्तु मुनिर्नारदो वदतां वरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो यय़ौ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
स एवमुक्तो गुरुणा कौसल्यो राजसत्तमः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
स एवमुक्तो गोविन्दः प्रत्युवाच महामनाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
स एवमुक्तो दुःखार्तः सत्यवागृषिसत्तमः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
स एवमुक्तो द्विपदां वरिष्ठो; नाराय़णेनोत्तमपूरुषेण |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजपुङ्गवः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तो नैच्छत् ||
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
स एवमुक्तो भगवान्भूत्वाथान्तर्हितस्ततः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
स एवमुक्तो मधुसूदनेन; गाण्डीवधन्वा रिपुषूग्रधन्वा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
भीष्म उवाच
स एवमुक्तो मान्धाता तेनोतथ्येन भारत |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
स एवमुक्तो वलवान्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तो वाढमित्युक्त्वा तदा तदृषभस्य पुरीषं मूत्रं च भक्षय़ित्वोत्तङ्कः प्रतस्थे यत्र स क्षत्रिय़ः पौष्यः ||
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
स एवमुक्तो विमुखश्चिन्ताव्याकुलमानसः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्तोऽश्विभ्यां लव्धचक्षुरुपाध्याय़सकाशमागम्योपाध्याय़मभिवाद्याचचक्षे |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्त्वा गत्वारण्यमुपमन्योराह्वानं चक्रे |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एवमुक्त्वा तां क्षत्रिय़ामामन्त्र्य पौष्यसकाशमागच्छत् ||
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
स एवमुक्त्वा द्विपदां वरिष्ठः; प्राणान्वशी स्वान्सहसोत्ससर्ज |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
स एवाभ्यधिको नित्यं त्रैलोक्यस्य शुभाशुभे |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स एवाश्वः श्वेतमश्वं प्रय़च्छ; त्स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
स एवास्तमुपागच्छंस्तदेवात्मनि यच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
स एवाय़ं मय़ा तुभ्यमाख्यातः प्रसृतो गुरोः ||
८० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
स एवाय़ं मय़ा तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः |
३ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
स एवेशश्च भूत्वेह परैराज्ञाप्यते पुनः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
स एवैनं नय़ेद्घोरं क्षिप्रं वैवस्वतक्षय़म् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
स एष एव भवति दस्युरेतानि वर्जय़न् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स एष कदनं कृत्वा महद्रणविशारदः |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
स एष काममन्युभ्यां प्रलव्धो मोहमास्थितः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
स एष किल निर्यातो वालभावान्न पौरुषात् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
स एष कृष्णो वार्ष्णेय़ः पुराणपुरुषो विभुः |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
स एष क्षत्रधर्मेण युध्यमानो रणाजिरे |
२९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स एष क्षत्रधर्मेण स्थानमेतदवाप्तवान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
स एष चरते वाय़ुरर्णवोत्पीडसम्भवः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत्सुतम् |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स एष ते सुतो राजँल्लोकसंहारकारणात् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
स एष देवश्चरति माय़या मोहय़ञ्जगत् ||
७९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
स एष निरय़ं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
स एष निहतः शेते भीष्मो भीष्मकृदाहवे ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
स एष निहतः शेते मद्रराजो महारथः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
स एष निहतः शेते व्रह्मदण्डेन राक्षसः |
४७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
स एष पक्षिभिः पक्षैः शय़ान उपवीज्यते ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
स एष पतितः शेते शरतल्पे पितामहः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
स एष परिभूय़ास्मानकार्षीदिदमप्रिय़म् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
स एष पाण्डोर्दाय़ाद्यं यदि प्राप्नोति पाण्डवः |
१५ क