कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो राजन्समन्ततः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतः शूरैः सर्वतोऽतिरथैर्भृशम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतः शूरो धार्तराष्ट्रैर्महारथैः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतः श्रीमान्भ्रातृभिः कुरुसत्तमः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतः सर्वैर्विष्वगश्वं नराधिपम् |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो मेने हर्षवाष्पाविलेक्षणः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा कथाभिरभिनन्द्य तान् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा तत्रैवोपविवेश ह |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतो राजा त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स तैः परिवृतो राजा प्रदीपैः काञ्चनैः शुभैः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा शुशुभे व्रह्मवादिभिः ||
४१ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा शुशुभेऽतीव कौरवः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः पुत्रैस्तदा धीमानानीतो वै सरस्वतीम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो नराधिप |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
स तैः शूरैरनुज्ञातो यय़ौ राजनिवेशनम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः सञ्छादय़ामास भीष्मं शरशतैः शितैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः समेत्याथ यदृच्छय़ैव; वैचित्रवीर्यं नृपमभ्यगच्छत् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः सम्पूजितो राजा शिवेनावेक्षितस्तदा |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
स तैः सह नरव्याघ्रैर्भ्रातृभिर्भरतर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
स तैजसेन भावेन यदि तत्राश्नुते रतिम् |
११९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
स तैरग्न्यर्कसङ्काशैः शरैराशीविषोपमैः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स तैरभिहतः सङ्ख्ये नामर्षय़त सौभराट् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स तैरभिहतो वाणैर्वहुभिस्तेन मोहितः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
स तैरभ्यर्द्यमानस्तु भीमसेनो महावलः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स तैरभ्याहतो गाढं शरैर्भीमसुतेरितैः |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
स तैरभ्याय़तैर्विद्धो राक्षसेन महावलः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तैरर्कपत्रैर्भक्षितैः क्षारकटूष्णविपाकिभिश्चक्षुष्युपहतोऽन्धोऽभवत् |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स तैरस्त्रैर्महावेगैर्ददाहाशु महावलः |
११२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स तैराचितसर्वाङ्गो वह्वशोभत भारत ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ||
१२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
स तैर्गुणैः संहतदेहवन्धनः; पुनः पुनर्जाय़ति कर्म चेहते |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
स तैर्भिन्नतनुत्राणः शुशुभे राक्षसोत्तमः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स तैर्महद्भिश्च महारथै; श्च तेजस्विभिर्वीर्यवद्भिश्च राजन् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
स तैर्विद्धः स्रवन्रक्तं प्रभिन्न इव कुञ्जरः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
स तैर्विद्धो महातेजा वज्रदत्तो महाहवे |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
स तैर्विद्धो महानागो विस्रवन्रुधिरं वभौ |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
स तैर्विद्धो महेष्वासः समन्तान्निशितैः शरैः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
स तैर्विभिन्नसर्वाङ्गः शुशुभे राक्षसोत्तमः |
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स तैर्हय़ैर्वातजवैर्वृहद्भिः; पुत्रो विराटस्य सुवर्णकक्ष्यैः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स तैश्चतुर्भिर्युय़ुधे यदूत्तमो; दिगीश्वरैर्दैत्यपतिर्यथा तथा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यताय़ुधै; र्वृतो गदापाणिरवस्थितैः स्थितः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स तैस्तु विद्धः परमद्विपो रणे; तदा परावृत्य भृशं प्रदुद्रुवे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
स तोत्त्रैरिव मातङ्गो वार्यमाणः पतत्रिभिः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
स तोमरं भास्कररश्मिसंनिभं; वलास्त्रसर्गोत्तमय़त्नमन्युभिः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स तोमरप्रासकरश्चारुमौलिः स्वलङ्कृतः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स तोमरैरर्ककरप्रभैस्त्रिभि; र्जनार्दनं पञ्चभिरेव चार्जुनम् |
१७ क