शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
स्रवन्ति ह्युदराद्गर्भा जाय़मानास्तथापरे |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
स्रवन्तीनां च कुञ्जेषु पर्वतोपवनेषु च ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
स्रवन्तीनां च पुण्यानां सुरसानि शुचीनि च |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
स्रवपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ||
१३९ ग
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहर्ता चापराजितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्वुध्येत भारत |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
स्रष्टारं जगतश्चापि महात्मा प्रभुरव्ययः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम् |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसापरम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
स्रष्टारं सर्वभूतानामङ्गिरास्त्वां ततोऽव्रवीत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स्रष्टारं सर्वभूतानामसितो देवलोऽव्रवीत् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
स्रष्टारं सर्वलोकानां परमात्मानमच्युतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशय़ेत् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
स्रष्टारौ ह्यसतश्चोभौ सतश्च पुरुषर्षभौ ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वय़म् |
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
स्रस्तहस्तैश्च मातङ्गैः शय़ानैर्विवभौ मही |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्रस्तांशुकमिवाक्षोभ्यैर्निम्नगानिःसृतैर्जलैः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
स्रस्ताभरणकेशान्ता एकान्तभ्रष्टवाससः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
स्रस्तैरङ्गैरनिलेनेव नुन्न; मश्वत्थपत्रं गिरिराजमूर्ध्नि ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
स्रुक्प्रग्रहवता राजञ्श्रीमान्वाक्यमथाव्रवीत् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
स्रुग्भाण्डं निशि गत्वा वा अपरे भुजगोत्तमाः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
स्रुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणाः सदा |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स्रुचावती नाम विभो कुमारी व्रह्मचारिणी ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स्रुचावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स्रुचावतीति धर्मात्मा तदर्षिगणसंसदि |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स्रुतरुधिरकृतैकरागवक्त्रो; भ्रुकुटिपुटाकुटिलोऽतिसिंहनादः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्रुव औदुम्वरः शङ्खास्तथा हेमविभूषिताः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
स्रुवप्रग्रहणो व्रात्यः कीनाशश्चार्थवानपि |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स्रुवहस्ताय़ देवाय़ धन्विने भार्गवाय़ च |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स्रुवहस्ताय़ देवाय़ सुखधन्वाय़ धन्विने |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
स्रुवहस्ताय़ पतय़े धन्विने भार्गवाय़ च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
स्रोतश्च यावद्गङ्गाय़ाश्छन्नमासीज्जगत्पते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
स्रोतसा यामुनेनेव शरौघेण परिप्लुतम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
स्रोतसा सहसा क्षिप्तं ह्रिय़माणं वलीय़सा ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
स्रोतसा ह्रिय़माणासु प्रजास्वविमना इव |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रिय़माणं वलीय़सा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
स्रोतसो मध्यमापन्नः कूलाद्वृक्ष इव च्युतः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
स्रोतस्तस्मात्प्रजाय़न्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
स्रोतांसि तस्माज्जाय़न्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रिय़ार्थाञ्शरीरभृत् |
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
स्रोतोमध्ये समागम्य वर्तन्ते तामसे गुणे ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
स्वं कलेवरमाविश्य शक्रं भीतमथाव्रवीत् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वं चादास्यामि भूय़ोऽहं पाप्मानं जरय़ा सह ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
स्वं चेत्कर्मफलं न स्यात्सर्वमेवाफलं भवेत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरय़ा सह ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरय़ा सह ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
स्वं चैव रूपं पुष्यन्तु लोकपालाः सहेश्वराः |
२० क