आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसन्धा जितेन्द्रिय़ाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
ध्यानेनावेद्य तं व्रह्मा कृत्वा च निय़तोऽञ्जलिम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
ध्यानोपरमणं कृत्वा विद्यासम्पादितं मनः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
ध्यानय़ोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ||
५२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
ध्यानय़ोगादुपागम्य निर्ममा निरहङ्कृताः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
ध्यानय़ोगादुपागम्य प्रसन्नमतय़ः सदा |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
ध्यानय़ोगाद्वलं लव्ध्वा प्राप्य चर्द्धिमनुत्तमाम् |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
ध्यानय़ोगेन विप्राश्च तं वदन्ति महौजसम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
ध्यानय़ोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहङ्कृताः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
ध्याय़ते धृतराष्ट्राय़ सहसोपेत्य दुःखितः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
ध्याय़तो विषय़ान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजाय़ते |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ध्याय़न्तं किं न मन्युस्ते प्राप्ते काले विवर्धते ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
ध्याय़न्तः प्रकिरन्तश्च वालान्वेपथुसंय़ुताः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ध्याय़न्तमर्जुनं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
ध्याय़न्निव च किं राजन्नाभिभाषसि किञ्चन ||
५५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
ध्याय़न्महोपनिषदं योगय़ुक्तोऽभवन्मुनिः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
ध्याय़न्स कृपणः पापो न लोकान्प्रतिपद्यते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
ध्याय़न्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
ध्याय़मानेषु सैन्येषु दुःखं प्राप्तेषु भारत |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
ध्याय़ेदेकान्तमास्थाय़ मुच्यतेऽथ निराश्रय़ः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रिय़माणं तु तच्छत्रं पाण्डुरं तस्य मूर्धनि |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
लोमश उवाच
ध्रिय़माणस्तु तुलय़ा कपोतो व्यतिरिच्यते |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रिय़माणे महावाहो मय़ि सम्प्रति केशव ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
ध्रिय़माणे मय़ि कथं हरिष्यसि निशाचर |
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
अर्जुन उवाच
ध्रिय़माणे हि पाञ्चाल्ये नाचार्यः काममाप्स्यति ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
ध्रिय़माणेन छत्रेण राजा राजति दंशितः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
ध्रिय़माणेन समरे तथा शतशलाकिना ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
कङ्क उवाच
ध्रुव एव जय़स्तस्य यस्य यन्ता वृहन्नडा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
धृतराष्ट्र उवाच
ध्रुवं कुरूणामय़मन्तकालो; महाभय़ो भविता शोणितौघः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं च त्वा हनिष्यामि शपे सत्येन तेऽग्रतः |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
ध्रुवं च श्रेय़सा राजा योक्ष्यते सह वान्धवैः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
ध्रुवं चाभावमभ्येति गत्वा गङ्गेव सागरम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं चास्यन्तमनिशं मुष्टिना समपोथय़त् |
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
ध्रुवं तथा तद्भविता जानीमस्तस्य निश्चय़म् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
ध्रुवं तस्य धनुश्छिन्नं रथो वापि गतो महीम् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश; स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं दुर्योधनो वीरो गतिं नसुलभां गतः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य; पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद्दीपशतं यथा |
६० क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि; ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
ध्रुवं प्रशान्ताः सुखमाविशेय़ु; स्तेषां प्रशान्तिश्च हितं प्रजानाम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं प्राप्स्याम च वय़ं राज्यमप्यवशे जने ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं भीष्मं विजेष्यामः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
ध्रुवं मृगय़से योग्यं तेनासि हरिणः कृशः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं मय़ि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराभवत् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं युद्धे हि मरणं शूराणामनिवर्तिनाम् |
६४ क