अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वकर्मभिर्मानवं संनिवद्धं; तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
स्वकर्मभिरय़ं वालः कालेन निधनं गतः ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
स्वकर्मभिश्च नहुषो नाशं यास्यति दुर्मतिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
स्वकर्मस्थान्विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
स्वकर्माण्यभिसन्धाय़ नाभिनन्दति मे मनः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
स्वकर्मय़ुगपद्भावो दशस्वेतेषु तिष्ठति |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
स्वकाः पितृष्वसुः पुत्रास्ते परैर्निकृता भृशम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
स्वकार्यकुशलाभ्यां ते सम्भ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ||
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
स्वकार्यदक्षिणौ राजन्गृध्रो जम्वुक एव च |
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
स्वकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्वकृतं ननु वुद्ध्वैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
स्वकृते का नु शान्तिः स्याच्छमाद्वहुविधादपि ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्वकृतेनाधिगच्छन्ति लोके नास्त्यकृतं पुरा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
स्वकृतैस्तानि यातानि भवांश्चैव गमिष्यति ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
स्वकेनाहमनीकेन संनद्धकवचावृतः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वकोशस्य परीमाणं कोष्ठस्य च महीपतिः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
स्वकोशात्तत्प्रदेय़ं स्यादशक्तेनोपजीवता ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
स्वक्षरं प्रश्रितं वाक्यं मधुरं चाप्यनुल्वणम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
स्वगुणं भक्षय़न्त्येते गुणवन्तः शुभाशुभम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्षं पृथग्जनात् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
स्वगृहादभिनिःसृत्य लाभालाभे समो मुनिः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
स्वङ्गं प्रच्छन्नशिरसं कम्वुग्रीवं प्रिय़ंवदम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहम् |
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वच्छन्दमरणं तस्मै ददौ तुष्टः पिता स्वय़म् ||
९४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा |
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वच्छन्दमरणाश्चासन्नराः स्वच्छन्दजीविनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वच्छन्देन सुतस्तुभ्यं गतः स्वर्गं शुभानने |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
स्वजनं तं प्रतीक्षामि पर्जन्यमिव कर्षकः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्वजनं हि यदा मृत्युर्हन्त्येव तव पश्यतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामेव नश्यति ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्वजने न च ते चिन्ता कर्तव्या मोक्षवुद्धिना |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मतिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
स्वजनेन त्ववज्ञातं परे परिभवन्त्युत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
स्वजातिकुलसम्पन्नाः स्वेषु कर्मस्ववस्थिताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
प्रह्राद उवाच
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
स्वजादन्यकृताच्चैव सर्वपापात्प्रमुच्यते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
स्वतन्त्रश्च स्वतन्त्रेण स्वतन्त्रत्वमवाप्नुते ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे व्रूहि कारणमत्र वै |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मय़ि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
स्वतन्त्रास्मीत्युवाचैनं न धर्मच्छलमस्ति ते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
स्वतन्त्रो जातु न क्रीडे मामकान्तरमाविशः ||
२१ ख