आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
स्वधर्मरतय़ो नित्यं व्रह्मलोकपराय़णाः ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
स्वधर्मविजितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन |
११२ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मस्थः परं धर्मं वुध्यस्वागमय़स्व च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
स्वधर्मस्थाः क्रिय़ावन्तो जनास्त्रेताय़ुगेऽभवन् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मस्थेषु वर्णेषु सोऽप्येतं नाभिपूजय़ेत् ||
६६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
स्वधर्मस्य परित्यागः परधर्मस्य च क्रिय़ा |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मस्याविरोधेन तदुदाहर केशव ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वधर्मात्प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
स्वधर्मात्सततापेते रमेय़ं वीर्यवर्जितः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
स्वधर्मानन्तरा वृत्तिर्यान्याननुपजीवतः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु ||
७२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
स्वधर्मे निधनं श्रेय़ः परधर्मो भय़ावहः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
स्वधर्मे यत्र रागस्ते कामं धर्मो विधीय़ताम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मे वर्तमानस्त्वं किं नु शोचसि पाण्डव |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
स्वधर्मे वर्तमानस्य सापवादेऽपि भारत |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
स्वधर्मेण क्रिय़ा लोके कर्मणः सोऽप्यसङ्करः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
स्वधर्मेण क्रिय़ा लोके कुर्वाणः सत्यसङ्गरः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
स्वधर्मेण क्रिय़ावांश्च कर्मणा सोऽप्यसङ्करः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मेण हता ह्येते क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मेणैव धर्मं च ते रक्षन्ति परस्परम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
स्वधर्मेभ्यः परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
स्वधाकारवषट्कारौ स्वाहाकारनमस्क्रिय़ाः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
स्वधाकारो नमस्कारः स्वाहाकारो वषट्क्रिय़ा |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
स्वधावन्तो वर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
स्वधीतस्य सुय़ुद्धस्य सुकृतस्य च कर्मणः |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
स्वधीता मानवश्रेष्ठ सत्यमेकं किलैकतः ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वनवन्तं महाशङ्खं वलवानरिमर्दनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
स्वनिश्चय़ं तं परनिश्चय़ं च; निवेदय़ेदुत्तरमन्त्रकाले ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां च व्यदधात्ततः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
स्वन्तं पुण्यं यशोवन्तं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ||
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वपक्षाश्चैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स्वपक्षे कारणं ग्राह्यं समर्थं वचनं हितम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
स्वपतां जाग्रतां चैव सर्वेषामात्मचिन्तितम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
स्वपत्नीप्रभवान्पञ्च लव्धान्क्रीतान्विवर्धितान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
स्वपत्न्यामाहितो गर्भ उतथ्येन महात्मना |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
स्वपन्ते च प्लवन्ते च छर्दय़न्ति च मानवाः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
स्वपन्निवान्तरिक्षे च जलविन्दुभिरुक्षितः ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
स्वपराद्धानपि हि तान्विषय़ान्ते समुत्सृजेत् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
स्वपुरं प्रेषय़ामास परिष्वज्य पुनः पुनः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वपुरं प्रय़यौ राजा चतुरङ्गवलानुगः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स्वपुरं शूरसेनानां प्रय़यौ भरतर्षभ ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
स्वप्तव्यं क्षत्रिय़ेणाजौ शरतल्पगतेन वै ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
स्वप्तव्यं नैव नग्नेन न चोच्छिष्टोऽपि संविशेत् ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स्वप्तुकामो न लभते स्वप्तुं कार्यार्थिभिर्जनैः |
१४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा वाधते मामिति प्रभो ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
स्वप्नः स्तम्भो भय़ं लोभः शोकः सुकृतदूषणम् ||
१२ ख